सोमवार, 7 अक्तूबर 2013

यहाँ सभी तुम जैसे ही हैं

Amar  Nadeem
माना कड़ी धूप है फिर भी, मन ऐसा घबराया क्या?
सूखे हुए बबूलों से ही, चले मांगने छाया क्या?

सुना है उसके घर पर कोई साहित्यिक आयोजन है;
हम तो जाहिल ठहरे लेकिन, तुम्हें निमंत्रण आया क्या?

बच्चा एक तुम्हारे घर भी कचरा लेने आता है;
कभी किसी दिन, उसके सर पर, तुमने हाथ फिराया क्या?

बिटिया है बीमार गाँव में, लिक्खा है-घर आ जाओ;
कैसे जायें! घर जाने में, लगता नहीं किराया क्या?

ऐसे गुमसुम क्यों बैठे हो! आओ, हमसे बात करो।
यहाँ सभी तुम जैसे ही हैं; अपना कौन, पराया क्या?
         ---------- amar  nadeem  

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