शनिवार, 12 अक्तूबर 2013

आशाराम का मीडिया ट्रायल


कभी कभी कुछ घटनाओं को दूसरी नजर से भी देखने को मन करता है .अब इस आशाराम वाले प्रकरण को ही देखिये. जिस तरह से तमाम टी वी चैनल हाथ धोकर आशाराम के परिवार के पीछे पड़े हैं उससे इनकी नीयत पर तो संदेह होता ही है कई और भी सवाल खड़े हो जाते हैं .सबसे पहला सवाल तो यही है कि इस घटना से पहले ये चैनल वाले कहाँ सोये पड़े थे ? क्या इन्हें पहले आशाराम की ये करतूतें दिखायी नहीं देती थी ? दूसरी बाते ये है कि क्या यही ढोंगी संत है बाकी सब दूध के धुले हैं ? उनकी  क्यूँ नहीं कुछ खोज खबर करते हैं ? तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि ये जिस तरह से लगातार आशाराम के ढोंगी संत रूप को प्रदर्शित करने में लगे हैं खतरा ये है कि अन्य धर्म के लोग उसे ही हिन्दुत्व का असली चेहरा बताकर उसी तरह दुष्प्रचार के लिए इस्तेमाल करें जिस तरह हिन्दुत्ववादी विधर्मियों के विकृत चेहरों को मजहबी बताकर करते रहते हैं. क्या आशाराम या निर्मल बाबा हिन्दू धर्म की पहचान हो सकते हैं ? अब क्या कबीर, रैदास, नानक,तुलसी, दयानंद ,विवेकानंद जैसे संत और सुधारक हिन्दू धर्म के संत समाज की पहचान होंगे या आशाराम और निर्मल बाबा ? ये सवाल उनसे तो है ही जो इनके बचाव में उतरे हैं ये सवाल उनसे भी है जो इनके नंगेंपन में रस ले रहें हैं . अब सवाल किसी आशाराम के दोषी या निर्दोष होने का नहीं है सवाल इस मीडियाई चटकारेपन का है,सवाल न्याय पालिका के किसी न्याय से पहले मिडिया ट्रायल का है .वो ट्रायल जो निष्पक्ष नहीं लगता है, प्रायोजित दिखता है, बिकाऊ लगता है .
    बलात्कार और छेड़छाड़ गंभीर अपराध है लेकिन तब मीडिया का चीरहरण या चरित्र हरण अभियान भी अपराध क्यूँ नहीं माना जाना चाहिए ? कल अगर अभियोजन पक्ष की बदनियति या साठ गाँठ से या तथ्यात्मक रूप से ही अभियोग सिद्ध न होने के कारण कोर्ट से आशाराम बरी हो गया तो क्या ये टी वी चैनल इतने ही दिनों तक किये गए अपने झूठे सच्चे प्रोपेगंडे के लिए माफ़ी मांगेगे ? क्या इनके माफ़ी माँगने से  उन लोगों को कोई राहत मिल सकती है जिनकी भावनायें इस प्रोपेगंडे से  आहत हुई हैं  ? ये  बिलकुल उसी तरह है जिस तरह आतंकवादी बताकर पकडे  गए  बेक़सूर  मुस्लिम नौजवानों के मामलें में देखा जाता है .कोर्ट से दोष मुक्त होने से पूर्व वे इतनी सजा भुगत चुके होते हैं जितनी अगर वो दोषी होते तो तब भी नहीं पाते. 

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