बुधवार, 20 नवंबर 2013

राजनीति में इतिहास का इस्तेमाल


    अपनी किशोरावस्था में जो किताबें मैंने पढ़ी थीं, उनमें से एक पुस्तक तेनजिंग नॉरगे की आत्मकथा थी। मैं देहरादून में बड़ा हुआ, जहां से निचले हिमालय के सुंदर दृश्य दिखाई देते थे। हम अक्सर पास में मसूरी जाया करते थे, जहां से नंदा देवी, त्रिशूल और बंदरपूंछ की चोटियां दिखाई देती थीं। मैं दमे का मरीज था, ऊंची चढ़ाइयां नहीं चढ़ सकता था, शायद इसीलिए मैंने तेनजिंग की आत्मकथा कई बार पढ़ी। उस किताब में दो घटनाएं मुझे अच्छी तरह याद हैं। पहली यह कि एडमंड हिलेरी ने अपनी आत्मकथा में लिखा था कि तेनजिंग नहीं, बल्कि वह खुद सबसे पहले एवरेस्ट पर पहुंचे थे। हिलेरी ने यह भी दावा किया था कि तेनजिंग को तो वह लगभग लादकर चोटी तक ले गए थे। तेनजिंग इसे पढ़कर बहुत दुखी हुए और उन्होंने हिलेरी के नस्लवादपूर्ण अहंकार की तुलना उनके प्रिय पर्वतारोही रेमंड लंबार्ड से की, जो तेनजिंग को हमेशा बराबरी के मित्र की तरह मानते रहे। दूसरी कहानी तेनजिंग की राष्ट्रीयता के विवाद की है। सन 1953 की गरमियों से पहले तेनजिंग की पहचान एक पिता, पति और पर्वतारोही की थी। पर जैसे ही वह एवरेस्ट के शिखर पर पहुंचे, तो चार देश उन पर दावा करने के लिए आगे आ गए। उनका शुरुआती जीवन नेपाल में बीता था, इसलिए नेपाल के लोग उन्हें अपने देश का मानते थे। वह दाजिर्लिंग में रहते थे, इसलिए भारतीय प्रेस का दावा यह था कि वह भारतीय हैं। वह बौद्ध थे, जिनका आध्यात्मिक केंद्र ल्हासा में था, इसलिए तिब्बतियों ने दावा किया कि वह तिब्बती हैं। तिब्बत चीन का एक प्रदेश या उपनिवेश था, इसलिए चीन की साम्यवादी सरकार का दावा यह था कि एवरेस्ट पर चढ़ने वाला पहला इंसान दरअसल एक चीनी सर्वहारा है। आत्मकथा में तेनजिंग ने इस बात पर एक व्यंग्यात्मक आश्चर्य जताया है। उन्होंने खुद को एक शेरपा माना था। लेकिन अब उन्हें चुनने के लिए कहा गया था कि वह नेपाली हैं, भारतीय हैं, तिब्बती हैं या चीनी?
    मुझे तेनजिंग की आत्मकथा तब याद आई, जब मैं जवाहरलाल नेहरू के मुख्यमंत्रियों के नाम पत्र पढ़ रहा था। बतौर प्रधानमंत्री नेहरू हर पखवाड़े मुख्यमंत्रियों को चिट्ठियां लिखते थे, जिनमें वह अपने विचार और सरकार की नीतियां स्पष्ट करते थे। सन 1980 के दशक में विद्वान राजनयिक जी पार्थसारथी ने उन्हें संपादित किया और वे इतिहासकारों के लिए एक महत्वपूर्ण धरोहर हैं। दो जुलाई, 1953 को लिखे अपने पत्र में नेहरू लिखते हैं: ‘एवरेस्ट पर चढ़ाई एक महान उपलब्धि है, जिसका हम सबको गर्व होना चाहिए। लेकिन यहां भी कई लोगों ने बहुत क्षुद्रता का और संकीर्ण राष्ट्रवाद का परिचय दिया है। इस बात पर विवाद हो रहा है कि तेनजिंग वहां पहले पहुंचे या हिलेरी और तेनजिंग भारतीय नागरिक हैं या नेपाली। तेनजिंग पहले पहुंचे या हिलेरी, इससे जरा भी फर्क नहीं पड़ता। दोनों ही एक-दूसरे की मदद के बिना ऐसा नहीं कर सकते थे। बल्कि दोनों उनकी पूरी टीम की मदद के बिना यह हासिल नहीं कर सकते थे। और इस बात को अगर मैं आगे बढ़ाऊं, तो यह पूरी टीम भी इसके पहले एवरेस्ट चढ़ने की कोशिश करने वालों के अनुभव, मेहनत और त्याग के बिना ऐसा नहीं कर सकती थी। महान मानवीय उपलब्धियां अनेक लोगों के सामूहिक प्रयासों से संभव होती हैं।
  यह हो सकता है कि एक व्यक्ति आखिरी कदम रखे, लेकिन अन्य लोगों को भी भुलाया नहीं जाना चाहिए। हमारे लिए यह अच्छी बात नहीं है कि हम इतना संकीर्ण और क्षुद्र राष्ट्रवाद इन मामलों में घसीटें और लोग सोचें कि हम हीनताग्रंथी के शिकार लोग हैं।’ आइजक न्यूटन ने कहा था कि वह दूर तक इसलिए देख पाए, क्योंकि वह बहुत बड़े लोगों के कंधों पर खड़े थे। मानवीय उपलब्धियां भले ही नई या मौलिक लगें, उनके पीछे कई पीढ़ियों का काम होता है। इसी तरह, बहुत व्यक्तिगत किस्म की उपलब्धि के पीछे किसी टीम का काम होता है। नेहरू का एवरेस्ट विजय का एक विश्लेषण उनकी अपनी महान उपलब्धि यानी एक संयुक्त व लोकतांत्रिक भारत के निर्माण में भी देखने में आता है। उनके सबसे बड़े भागीदार और साथी वल्लभभाई पटेल थे। आजकल की जहरबुझी इकतरफा राजनीति में दोनों में से किसी एक को आधुनिक भारतीय राष्ट्र के निर्माण का श्रेय दिया जाता है। कांग्रेस नेहरू को याद करना चाहती है और पटेल को भूल जाती है। भारतीय जनता पार्टी का दावा है कि सरदार पटेल उनके थे और भारत निर्माण में उनकी भूमिका नेहरू से कहीं ज्यादा थी।
  वास्तविकता यह थी कि नेहरू और पटेल की एक शानदार जोड़ी थी। नेहरू के धार्मिक और भाषिक बहुलतावाद तथा लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता के बिना भारत कई सांप्रदायिक झगड़ों का शिकार हो जाता। पटेल ने रजवाड़ों को एक करके और संविधान के निर्माण में नेतृत्व देकर भारत को क्षेत्रीय व राजनीतिक रूप से एक बनाया। नवंबर 1949 में छपे एक लेख में पटेल ने यह बताया है कि कैसे नेहरू से उनके रिश्ते को गलत ढंग से पेश किया गया है और भविष्य में किया जाएगा। पटेल ने लिखा, ‘कुछ स्वार्थी लोगों द्वारा प्रचारित और कुछ अज्ञानी समूहों में मान्य धारणा के विपरीत हम दोनों ने आजीवन मित्र और सहयोगी की तरह काम किया।’ उन्होंने आगे लिखा, ‘चूंकि मैं उनसे उम्र में ज्यादा था, इसलिए मेरा यह सौभाग्य रहा कि मैं उन्हें प्रशासन और संगठन के मामलों में सलाह देता था और मैंने उन्हें हमेशा मेरी सलाह के लिए उत्सुक और उसे मंजूर करने के लिए तैयार पाया।’ आजकल जिस तरह कहा जाता है, नेहरू और पटेल के बीच वैसी कट्टर दुश्मनी होती, तो आजादी के बाद भारत बिखर जाता। उनके परस्पर सहयोग ने ही भारत को एकता के सूत्र में बांधा। एक बहुलतावादी सामाजिक माहौल बनाया और संसदीय लोकतंत्र की नींव रखी। इसके अलावा, नेहरू और पटेल अपने अन्य मंत्रिमंडलीय सहयोगियों पर निर्भर होते थे, खासकर अंबेडकर पर।
  कांग्रेस पार्टी, खासकर उसके पहले परिवार ने नेहरू की विरासत को बहुत नुकसान पहुंचाया है। उसने नेहरू के नाम पर कब्जा करके उन राहों को बंद कर दिया, जो किसी भी राजनीतिक विचारधारा के भारतीयों को अपनानी चाहिए थी और जिनकी मिसाल नेहरू ने कायम की थी। एवरेस्ट पर पहली सफल चढ़ाई के बाद नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को भारत की वास्तविक या काल्पनिक महानता के संकीर्ण गुणगान से बचने की सलाह दी। उन्होंने लिखा- ‘मैं दूसरे देशों की तुलना में अपने देश की प्रशंसा के खेल में शामिल नहीं होना चाहता। हर देश में ऐसी सोच मिलती है।’ संकीर्ण राष्ट्रवाद के प्रति नेहरू का विरोध उनके प्रधानमंत्री बनने के बहुत पहले से था। 14 दिसंबर, 1932 को अपनी बेटी इंदिरा को उन्होंने जेल से चिट्ठी लिखी- ‘राष्ट्रवाद अपनी जगह ठीक है, लेकिन वह अविश्वसनीय मित्र और अनिश्चित इतिहासकार है। वह हमें कई घटनाओं से आंखें मूंदने पर मजबूर कर देता है, कभी-कभी सत्य को विकृत करने की प्रेरणा देता है, खास तौर पर जब वह हमारा अपना इतिहास हो।
       इसलिए हमें भारत के ताजा इतिहास के मद्देनजर अपने दुर्भाग्य का सारा दोष अंग्रेजों पर मढ़ने से बचना चाहिए।' आधुनिक भारत के हर इतिहासकार की मेज पर ये शब्द रहने चाहिए और हर विचारधारा के प्रचारक के लिए भी यह सही है।
                                                             --------रामचंद्र गुहा [प्रसिद्ध इतिहासकार]
राजनीति में इतिहास के इस्तेमाल पर विश्लेषण
http://www.livehindustan.com/news/editorial/guestcolumn/article1-story-57-62-377483.html

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