गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

समलैंगिकता को सुरक्षा देने वाला हाई कोर्ट का आदेश निरस्त



आज सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को सुरक्षा देने वाला हाई कोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया और धारा 377 फिर से लागु कर दी,अब अगर इस निर्णय का पोस्टमार्टम करे तो साफ़ झलकता है की २००९ में दिल्ली हाई कोर्ट के निर्णय की पुरजोर खिलाफत करने वाली आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड , उत्कल क्रिश्चियन काउन्सिल और अपोस्टोलिक चर्चेस अलायंस जैसी धार्मिक संस्थाओं ने लगातार दबाव बनाया की यह निर्णय वापिस लिया जाए,भारत सरकार की और से दिए गए जवाब में ये कहा गया था की भारतीय समाज में ऐसे रिश्तों के प्रति कोई असहजता नहीं दिखती और धारा 377 ब्रिटिश शासकों द्वारा लाया गया था ....जो भी अब ऐसे निर्णयों की प्रासंगिकता का तो पता नहीं पर अब डर सा लगने लगा है की आप और हम ऐसे देश में रहते है जहा क्या करना है और क्या नहीं ये धार्मिक संस्थाए निर्धारित करती है,
       आज भी इस देश और दुनिया में कुछ ऐसे धर्म के ठेकेदार है जो ये समझते है की उनकी ५००-१००० साल पुरानी किताबो में लिखा ज्ञान दुनिया का संविधान बन जाना चाहिए ....लेकिन इन सब के बीच दबा कुचला सा मानव खुले आँखों से एक आज़ाद दुनिया में रहने का सपना देखता है
कोर्ट का यह प्रतिगामी निर्णय वास्तविक दलितों और अल्पसंख्यकों के जन्मजात अधिकार का अतिक्रमण है. जो लोग दलितों और अल्पसंखयकों के हामी हैं उन्हें समलैंगिकों के पक्ष में आवाज उठानी चाहिए.          
                 समलैंगिकों के पक्ष में बोलने के लिए समलैंगिक होना उसी तरह जरूरी नहीं है जिस तरह आप दलितों,अल्पसंख्यकों,महिलाओं,और बच्चों के हक़ में बोलते हुए ये सब नहीं हो जाते हैं. एक लोकतांत्रिक समाज में अल्पसंख्यकों के सम्मान और अधिकार को पूरा सरंक्षण दिया जाता है और समलैंगिक सही मायने में अल्पसंखयक हैं साथ ही दलित भी.  
        आपको शाहबानों प्रकरण याद है ? कोर्ट ने एक असहाय औरत के हक़ में फैसला दिया था लेकिन वोटों के सौदागरों ने वोटों के लालच में संसद में क़ानून बनाकर कोर्ट के प्रगतिशील फैसले को पलट दिया और मुस्लिम  औरत को  कठमुल्लाओं से  रहम की भीख माँगने के लिए  छोड़  दिया जो उसे कभी मिल ही नहीं सकती  है.
लेकिन लगता  है अब  कोर्ट भी कटटरपंथियों  के दबाव  में फैसले  देने  लगा  है. समलैंगिकों के मामलें  में सबसे  ज्यादा  शौर  धार्मिक  कटटरपंथियों  ने मचाया  है .जबकि  मजेदार  बात  ये है कि  सबसे  ज्यादा  समलैंगिक भी धार्मिक  ठिकानेदार  ही मिलते  हैं. ये तथ्य  चर्च  की  ननों, पादरियों  से  लेकर सभी धर्मों के कर्ताधर्ताओं  के बीच मौजूद है.धर्म संचालित संस्थाओं  में समलैगिंकता के प्रकरण ज्यादा मिलते हैं क्यूँकि  प्रत्येक  धर्म के ठेकेदारों  ने स्त्री  पुरुष  के स्वाभाविक  सम्बन्धों  को पाप  बताया  है और ईश्वर  कि प्राप्ति  में उसे  बड़ी  बाधा  कहा  है .इसीलिए  समलैंगिक सम्बन्धों  के पनपने  के लिए  वहाँ  सबसे ज्यादा उर्वर  जमीन  है. लेकिन फिर  भी ये लोग विरोध  कर  रहें हैं और इन लोगों के विरोध के कारण ही कोर्ट ऐसे फैसले सुना रहा है .ये फैसला ऐसे  वक्त  में आया  है जब  हमारे  पड़ौसी  देश  नेपाल  ने जो हाल  तक  एक मात्र  हिन्दू  राष्ट्र  है समलैंगिकता  को कानूनी  मान्यता  दे  दी  है .    
   अगर  संविधान  में समलैंगिक सम्बन्धों  के लिए फाँसी  का प्राविधान  कर  दिया जाए और उस  पर  सख्ती  से अमल  भी किया  जाए तो बड़े बड़े धर्मात्मा  फाँसी  के फंदे  पर  झूलते  नजर  आयेंगे .
सुप्रीम कोर्ट ने Delhi हाई कोर्ट के निर्णय को पलटते हुए homosexuality (समलंगीगता) को गैर क़ानूनी घोषित करके दिया है।  सुप्रीम कोर्ट  क़ा निर्णय अमानवीय है
        अगर विश्व की बात करे तो 94 देशो ने इससे क़ानूनी सहमति दी है, 54 देशो में यह गेर क़ानूनी है और 46 देशो ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नही दी है.सौदी अरब, अफ़ग़ाणिस्तान, येमन, ईरान, नाइजीरिया देशो में तो इसकी सज़ा मौत है।
       बलात्कारी और समलैंगिक के फर्क को समझिये. बलात्कार जबरन व्याभिचार  है जबकि समलैंगिक सम्बन्ध सहमति से किया गया कामाचार है.  दो वयस्कों के बीच कामाचार सहमति समाज सम्मत है जबकि जोर जबरदस्ती जुर्म है. जहाँ तक समाज को प्रभावित करने वाली बात है तो समाज में प्रेम करने वाले भी उपयुक्त प्रेमी प्रेमिका की खोज में रहते हैं उनसे अगर समाज में संकट नहीं पैदा होता है तो इनसे भी कहाँ खतरा है ?
            असल में खतरा धर्म ढ़ंगियों को है जो सबसे ज्यादा समलैंगिक हैं और अपनी पहचान उजागर होने से डरते हैं .डरते हैं कि कहीं उनके चहरे से पवित्रता का मुखौटा न उतर जाए .पवित्रता जो काम सम्बन्धों से दूर रहने में है .धर्म धुरंधरों ने स्वाभाविक काम सम्बन्धों को ईश्वर तक पहुँचाने की राह में बड़ी बाधा बताया है और  ऐसे सम्बन्धों में आसक्ति रखने वाले को पापी करार दिया है. वे  कहते  हैं कि  'स्त्री  की झाँई पडत अँधा होत भुजंग, उनका कौन हवाल है जो नित नारी के संग ?' तो धार्मिक प्रचारक कहते हैं स्त्री से दूर रहो.अब स्त्री से दूर रहो तो स्वाभाविक बात है कि पुरुष पुरुष के और स्त्री स्त्री के नजदीक रहेंगे.जेल से लेकर फ़ौज तक, मठों से लेकर मदरसों तक जहाँ भी स्त्री पुरुष के स्वाभाविक सम्बन्धों पर प्रतिबंध है वहाँ समलैंगिकता के प्रकरण ज्यादा हैं. वहाँ आत्म रति के प्रसंग इससे भी ज्यादा हैं . लेकिन विडम्बना देखिये कि सबसे ज्यादा विरोध भी यहीं है. ये अलग बात है कि दबे ढके चलता रहे तो कोई विरोध नहीं है लेकिन उसे कानूनी मान्यता मिले ये बर्दाश्त के बाहर है.गुड खाये गुलगुलों से परहेज ? भाई ये क़ानून किसकी मदद कर रहा है ? ये तो आपके हक़ में है कि वे सारे क़ानून रद्द किये जाएँ जो दो वयस्कों की परस्पर सहमति से बंद कमरे में सहवास को प्रतिबंधित करते हैं. क्या ऐसे सम्बन्ध अप्राकृतिक और अपराध हैं या उसकी ताक झाँक करना अपराध है ? सुप्रीम कोर्ट का फैसला बंद कमरे में सहवास की ताक झाँक करने का कानूनी अधिकार  देता है जो निजता  के संविधानिक और नैसर्गिक अधिकार का उल्लघन है .अत:  संसद द्वारा रद्द किये जाने के योग्य है. भले ही धर्म के धंधेबाज और समाज के ठेकेदार हाय तोबा मचाये, भले ही वोट कुछ कम हो जाएँ लेकिन धरा 377 रद्द होनी ही चाहिए.        



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