सोमवार, 16 दिसंबर 2013

अभी नहीं तो कभी


                                                        
         हाल फिलहाल के चुनावों में हार के बाद राहुल गाँधी का चेहरा देखने लायक है. उनके चहरे पर हताशा के भाव साफ़ नजर आते हैं. उन्होंने पूरी मेहनत और ईमानदारी से चुनाव अभियान का नेतृत्व किया लेकिन इस सरकार से लोग इतने ऊब चुकें हैं कि वे हर हाल में बदलाव चाहते हैं चाहे उसके नतीजे कुछ भी क्यों न हो. खैर हमें उनसे पूरी हमदर्दी है उन्होंने दागी नेताओं को सजा देने से रोकने वाले बिल को रद्द कराने के साथ साथ कई जनहितकारी कार्यक्रमों को लागू  करने में अपना सहयोग दिया है.लेकिन क्या किया जा सकता है ? ये लोकतंत्र है जनता अगर बदलाव चाहती है तो जनता को इसका हक़ है. अभी भी राहुल गाँधी बहुत कुछ ऐसा कर सकते हैं जिसके लिए लोग बाद में उन्हें उनके पिता राजीव गाँधी कि तरह याद करेंगे.जो भारत में विज्ञान और तकनीक का नया युग लाने के लिए याद किये जाते हैं साथ ही देश में पंचायती राज व्यवस्था को लागू करने का श्रेय भी उन्हें प्राप्त है.
   प्रभावी लोकपाल बिल पास करकार राहुल गाँधी भी ऐसा ही काम कर सकते हैं.लेकिन एक बात महसूस की जा रही है कि अब पूरी केंद्र सरकार और यू पी ए - २ का नेतृतव  कर रही कांग्रेस रक्षात्मक मुद्रा में आ गयी है .उनका आत्म विश्वाश रसातल में पहुँच गया है. भाजपा ने लोकपाल बिल पास कराने की हामी भर दी तो लोकपाल बिल पास करने की तैयारी हो गयी है लेकिन आर एस एस के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमति होने की बात कहते ही धारा तीन सौ सतहत्तर को रद्द करने की घोषणा से वह पीछे हट रही  है . इससे ऐसा लगता है कि अब देश में संघ का एजेंडा ही चलेगा. नहीं तो कोई वजह नहीं थी कि संघ की राय आने के बाद  इस मामले में निर्णय को स्थगित किया जाता. ये कहना कि अभी इस मामलें कोई अध्यादेश नहीं लाया जाएगा यही प्रकट करता है .लेकिन हम जानते हैं की  इस अभी नहीं का मतलब कभी नहीं है. क्यूँकि फिर आपको कोई मौका मिलने वाला ही नहीं है. फिर तो ज्यादा संभावना ये है कि आने वाले समय में तालिबान सरीखे कायदे क़ानून ही देश में बनाये और माने जायेंगे . आखिर वे भी तो सब कुछ धर्म, संस्कृति,समाज  और  नैतिकता कि रक्षा के नाम पर ही करते हैं. अब उसमें कितनी नैतिकता और संस्कृति है और कितनी मानसिक विकृति ये तो जग जाहिर है.
 यहाँ ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो समलैंगिकता को मानसिक रोग मानते हैं. ये रोग है या नहीं है इस पर भारी वाद विवाद हो सकता है लेकिन जो लोग बेडरूम में ताक झाँक को अपना अधिकार समझते हैं और इसे अपनी समझ से इस्तेमाल करने के लिए डंडें से लेकर क़ानून तक का इस्तेमाल करना चाहते हैं  उनके मानसिक रोगी होने में कोई शक की गुंजायश नहीं है. ऐसे मानसिक रोगियों के उपचार की कोई पुख्ता व्यवस्था करने की बाजए सुप्रीम कोर्ट उन्हें ऐसा करने का लाइसेंस प्रदान कर दिया  है. अब जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि या तो सरकार इस क़ानून में बदलाव करे या इसका उल्लंघन करने वाले को सजा दे, इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है. अब सरकार कैसे बदलाव करेगी? .उसे तो चुनाव परिणामों का लकवा मार गया है .वह लुंज पुंज है. उसके बहुत से सहयोगी उससे पीछा छुड़ाने के बहाने खोजने लगें हैं .ज्यादातर आगामी लोक सभा चुनाव से पहले पीछा छुड़ा भी लेंगे.लेकिन सारे काम चुनाव जीतने के लिए ही नहीं किये जाते हैं.कुछ काम ऐसे भी करने होते हैं जिनका महत्व दूरगामी होता है .अगर जनमत के अनुसार ही चला जाता तो न तो सती प्रथा का अंत होता न बाल विवाह का. न अंतरजातीय विवाह को मान्यता मिलती न वधु दहन और दहेज़  ग्रहण  पर रोक लगती, अस्पृश्यता का भी अंत नहीं होता .आरक्षण भी नहीं मिलता. लेकिन आज कोई भी नहीं चाहेगा ये सारे जनहित के क़ानून रद्द करके पुरानी सामाजिक व्यवस्था को कायम किया जाए. तब किसने नहीं कहा था कि ऐसा करने पर हमारी संस्कृति नष्ट हो जायेगी ओर हमारा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा ? लेकिन संस्कृति भ्रष्ट हुई हो या धर्म भ्रष्ट हुआ हो जो जनहित  में था वो क़ानून बना और लागू हुआ. समाज की मानसिकता में भी धीरे धीरे बदलाव आया. आज सवर्ण जाति की लड़की भी दलित से शादी कर लेती है ओर क़ानून का सरक्षण भी पाती है ओर समाज भी स्वीकार ही लेता है भले ही ये अभी गांवों में न होता हो लेकिन शहरों में है ओर कोई आसमान नहीं टूटता है.   आज कोई भी  ये नहीं कहेगा कि जो दिल्ली मुम्बई के लोगों की सोच है वही राजस्थान बिहार के लोगों की भी सोच होगी. लेकिन सोच की राह भी  महानगर की ओर ही जाती है औऱ महानगरीय संस्कृति सारी दुनिया में एक सी हो रही है. इसमें कुछ बुरा भी नहीं है .अब दुनिया सही मायनों में एक नीड़ में  बदल रही है. उस नीड़ के मानव पंख फैलाकर चाँद ओर मंगल की ओर उड़ान भर रहें हैं ओर हम हैं कि सड़े तालाबों की बू को संस्कृति का नाम देकर उसकी रक्षा कि लिए हाय तोबा कर रहें हैं .संस्कृति के इन राक्षसों को जिन्हें हमने रक्षक समझा है दूर करना ही होगा. ये काम युवा ही कर सकते हैं और राहुल गाँधी वो युवा हैं जो  ये सब  करने में सक्षम हैं.                                      

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