सोमवार, 30 दिसंबर 2013

'रहिमन पानी राखिये '


    
      जल ही जीवन  है.दिल्ली में आप की सरकार ने साढ़े छह सौ लीटर पानी हर परिवार को मुफ्त देने का ऐलान कर दिया है. वैसे तो हर परिवार तक पानी पहुंचाने  की सुचारु व्यवस्था ही अभी नहीं है लेकिन अगर ये व्यवस्था भी हो जाए तो सवाल ये है कि क्या दिल्ली  के पास सबको  देने के लिए पर्याप्त पानी है ? दिल्ली के पास पानी नहीं है. दिल्ली को अपने पड़ौसी राज्यों से पानी मिलता है. गर्मी के मौसम में जब नदियों में पानी की कमी हो जाती है और दिल्ली के पड़ौसी राज्यों पंजाब हरियाणा और उत्तर प्रदेश में सिंचाई के लिए पानी की समस्या कड़ी हो जाती है तो वे राज्य अपनी फसलों को बचाने के लिए दिल्ली को पानी की आपूर्ति का विरोध  करते हैं.
        ये सही है कि दिल्लीवासियों को जिन्दा रहने के लिए पर्याप्त पानी की आपूर्ति आवश्यक है लेकिन कोई भी राज्य देश के अन्नदाता किसानों के जीवन को दांव पर लगाकर पानी नहीं दे सकता है. किसान की फसल का सूख जाना उसके प्राणों का थम  जाना होता है. इसलिए पानी की उनकी आवश्यकता की पूर्ती उनके प्राणों की  रक्षा के लिए ही नहीं बल्कि सारे देश वासियों के प्राणों की रक्षा के लिए जरुरी है.किसान ही तो है जो सबको जिन्दा रहने के लिए रोटी देता है .इसलिए जहाँ यह जरुरी है कि महानगर वालों को पेयजल मिलें वहीँ देश के अन्नदाताओं को भी पर्याप्त पानी मिले. इसके लिए जरूरी है कि हमारी नहरों में पर्याप्त जल रहे. इसके लिए नदियों का अधिक दोहन होगा और तब पर्यवारण की सुरक्षा के लिए चिंतित  लोग आगे आयेंगे. वे विरोध  करेंगे कि नदियों के पानी को बेतरतीब तरीके से न रोका जाए. इससे नदियां जलहीन हो जाती हैं. नदियां जलहीन होती हैं तो उसमें रहने वाले जीव मर जाते हैं. अब मछलियां  कहीं फ़रियाद करने जायेंगी नहीं, मगरमच्छ तो वैसे ही झूठे आंसू बहाने के लिए बदनाम है इसलिए उसका  घर उजड़ने का दर्द कौन समझेगा ? लेकिन जिन्दा रहने का हक़ तो सबको है, उन्हें भी है. इसलिए जिनके हक के लिए कोई नहीं बोलता  है उनके हक़ में  बोलने के लिए कुछ सिरफिरे मेधा पाटेकर  जैसे कर्मयोगी जरूर आयेंगे .और वे आयें भी क्यूँ नहीं ? पर्यावरण की सुरक्षा का सवाल तो खुद इंसान के जीवन का सवाल है .ऐसा थोड़े ही है मछलियां और मगरमच्छ, कछुए और केकड़े सिर्फ अपने लिए ही जीतें हैं वे मनुष्य को भी बहुत कुछ देते हैं .लेकिन मानव सिर्फ अपनी सोचता है, वो भी बहुत दूर की नहीं सोचता है.वो अपनी तात्कालिक जरूरतें पूरी होते देखना चाहता है. वह यह भी नहीं सोचता है कि उसने अपनी जरूरतें ही बहुत ज्यादा बढ़ा ली हैं .
     अब पानी को ही लीजिये. मुझे अपना बचपन याद है.अपने पीने और अन्य घरेलू जरूरतों के लिए हम कुयें से पानी भर कर लाया करते थे. बारह सदस्यों का परिवार दिन भर में लगभग बारह घड़े पानी से बहुत अच्छे तरीके से काम चलाता था.  पशुओं को पास के पोखर में पानी पिला लाया करते थे.वहीँ उन्हें नहलाते थे और खुद भी डुबकी लगा लेते थे. अब पोखर अधिकाँश हमने पाट दियें हैं या उनमें बदबूदार पानी जमा होता है जिसके पास से गुजरते भी नाक दबाकर चलना पड़ता है. और जहाँ तक पानी की बात है अब जितना पानी पूरा परिवार इस्तेमाल करता था उतना तो एक मोटर साईकिल की धुलाई में बहा दिया जाता है. नहाने धोने में भी पानी का अपव्यय तो होता ही है उसे तरह तरह के डिटरजेंट  से प्रदूषित भी कर दिया जाता है.
       इसी तरह हमने  पानी का दुरुपयोग कर या तो नदियों को सुखा दिया है या उन्हें गंदे नाले में बदल दिया है. पहले नदियों के किनारे मेले लगते थे. लोग नदी स्नान का पर्व मनाते थे, नदी का दृश्य मनोहारी होता था लोग उसे देखने के लिए दूर से आया करते थे .नदी के किनारे बसना पिछले जन्मों का पुण्य माना जाता था. अब लोग नदियों से दूर रहना चाहते हैं.उसके जल की बदबू ने और उस जल से भूजल के प्रदूषित होने से लोगों की जिंदगी नरक हो गयी है. यद्यपि ये सब लोगों का ही किया धरा है. लेकिन जिसे विकास कहा जाता है और जिसकी और हम अंधा होकर भाग रहें हैं ये उसकी ही परिणति है.
           दिल्ली में आप की सरकार जीवन को सहज बनाना चाहती है लेकिन जो लोग  ऐश कर  रहें हैं कुछ उन पर भी लगाम लगनी चाहिए. क्योंकि सारी समस्याओं की जड़ ये विलासिता पूर्ण जीवन ही है जिसे पाने के लिए हम प्रकर्ति का अंधाधुंध दोहन कर रहें हैं.इसलिए इस पर तो अंकुश लगाना ही चाहिए  अन्यथा ये कोई सही ना होगा कि राजधानी के बासिंदों के लिए खेत खलिहान और नदी पहाड़ों के बासिंदों की बली ली जाये.                              

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