शनिवार, 11 जनवरी 2014

टोपी












 
           
गांधी टोपी अमूमन खादी से बनाई जाती है और आगे और पीछे से जुड़ीं हुई होती है, तथा उसका मध्य भाग फुला हुआ होता है. इस प्रकार की टोपी के साथ महात्मा गांधी का नाम जोड़कर इसे गांधी टोपी कहा जाता है. परंतु गाँधीजी ने इस टोपी का आविष्कार नही किया था.
वास्तव में इस प्रकार की टोपी भारत के कई प्रदेशों जैसे कि उत्तर प्रदेश, गुजरात, बंगाल, कर्नाटक, बिहार और महाराष्ट्र में सदियों से पहनी जाती रही है. मध्यमवर्ग से लेकर उच्च वर्ग के लोग बिना किसी राजनैतिक हस्तक्षेप के इसे पहनते आए हैं. इस प्रकार से देखा जाए तो महात्मा गांधी के जन्म से पहले भी इसटोपी का अस्तित्व था.


 










                 
         
      लेकिन गाँधीजी ने इस टोपी की लोकप्रियता को बढाने मे उल्लेखनीय योगदान दिया था. बात उस समय की है जब मोहन दास गांधी दक्षिण अफ्रीका में वकालत करते थे. वहाँ अंग्रेजों के द्वारा किए जा रहे अत्याचारों से दुखी होकर मोहन दास गांधी ने सत्याग्रह का मार्ग अपनाया था. उस समय अंग्रेजों ने एक नियम बना रखा था कि हर भारतीय को अपनी फिंगरप्रिंट्स यानि हाथों की निशानी देनी होगी. गाँधीजी इस नियम का विरोध करने लगे और उन्होने स्वैच्छा से अपनी गिरफ्तारी दी. जेल में भी गाँधीजी को भेदभाव से दो चार होना पडा क्योंकि अंग्रेजों ने भारतीय कैदियों के लिए एक विशेष प्रकार की टोपी पहनना जरूरी कर दिया था.

      आगे चलकर गाँधीजी इस टोपी को हमेशा के लिए धारण करना और प्रसारित करना शुरू कर दिया जिससे कि लोगों को अपने साथ हो रहे भेदभाव याद रहें. यही टोपी आगे चलकर गांधी टोपी के रूप में जानी गई.
गाँधीजी जब भारत आए तो उन्होने यह टोपी नही बल्कि पगडी पहनी हुई थी. और उसके बाद उन्होने कभी पगडी अथवा गांधी टोपी भी नही पहनी थी, लेकिन भारतीय नेताओं और सत्याग्रहियों ने इस टोपी को आसानी से अपना लिया. कॉंग्रेस पार्टी ने इस टोपी को गाँधीजी के साथ जोडा और अपने प्रचारकों एवं स्वयंसेवकों को इसे पहनने के लिए प्रोत्साहित किया. इस प्रकार राजनैतिक कारणों से ही सही परंतु इस टोपी की पहुँच लाखों ऐसे लोगों तक हो गई जो किसी भी प्रकार की टोपी धारण नही करते थे.












       
          भारतीय नेता और राजनैतिक दल इस प्रकार की टोपी के अलग अलग प्रारूप इस्तेमाल करते थे. सुभाष चन्द्र बोस खाकी रंग की तो हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता काले रंग की टोपी पहनते थे.
                                                              [http://hi.विकिपीडिया.org/s/dt4मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से]
 भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने अब भगवा रंग की टोपी धारण कर ली है यह नयी राजनीतिक पार्टी आम आदमी पार्टी का  प्रभाव है जिसने आम आदमी लिखी सफ़ेद टोपी धारण करके भारतीय राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बनायी है .
आज भी टोपी की प्रासंगिकता बनी हुई है. जहाँ भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस सफ़ेद टोपी अभी भी अपनाए हुए है वहीं समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता लाल रंग की टोपी पहनते हैं और भारतीय किसान यूनियन के कार्यकर्ता हरे रंग की टोपी पहनते हैं.
सफ़ेद रंग स्वच्छता और शुद्धता  का प्रतीक है इसलिए गांधी टोपी सफ़ेद रंग की है जिसे अन्ना ने पहना है और केजरीवाल ने भी उस पर आम आदमी की आस्था सिद्ध की है. लाल रंग क्रान्ति और परिवर्तन का  प्रतीक है इसलिए समाजवादी विचारधारा के लोगों ने लाल रंग की टोपी पहनी है. हरा रंग प्राकृतिक समृद्धि और भव्यता का प्रतीक है यह हमारी शस्य श्यामला धरती की उर्वरता  को भी दर्शाता है इसलिए किसान संगठनों ने हरे रंग की टोपी अपनायी लेकिन काले रंग में ऐसी कोई ख़ास बात नहीं नजर आती .ये रंग क्रूरता और नीचता का प्रतीक माना जाता है [ यद्यपि मैं इससे असहमत हूँ लेकिन जैसा माना जाता है वह कह रहा हूँ ] फिर आर० एस०  एस०  ने काले रंग की टोपी को क्यों अपने स्वयंसेवकों के लिए चुना है ? शायद इसकी घृणित पहचान का एहसास  उन्हें   भी होता रहा है संभवत: इसीलिए भाजपा  के कार्यकर्ताओं ने भगवा रंग की टोपी पहनना  शुरू  कर दिया   है. भारतीय परम्परा में भगवा रंग ज्ञान, शौर्य और बलिदान का प्रतीक रहा है.
देखना  ये है कि भाजपा कार्यकर्ता  भगवा रंग की पवित्रता  का सम्मान  बनाये  रखते  हैं या  उसे  कलंकित  करते  हैं जिसके  लिए वो  जाने  जाते  हैं .      

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