सोमवार, 20 जनवरी 2014

गजल - बादल चला बिगड़ कर

अपने गीले बाल सुखाने जब आयी वो छत पर
खुलकर धूँप हँसी सूरज की, बादल चला बिगड़ कर .

जो कच्ची मिटटी की मूरत वो बारिश से डरते
सच्चे सूरजवंशी बच्चे खेल रहे हैं डटकर .

हौले हौले चाँद गगन में रहा रात भर चलता
बादल उमड़ा घुमड़ा गरजा फिर रह गया सिमट कर .

मैं नन्हा तन्हा पौधा था धरती तक झुक जाता
तूफानों से टकराये पर, बरगद रहे उखड़कर .

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