गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

आजाद देश के गुलाम सेवक


कश्मीर विधानसभा अध्यक्ष मुबाकर गुल ने मार्शलों को नारेबाजी कर रहे पीडीपी विधायक बशीर को हटाने का आदेश दिया. मार्शल जब दक्षिण कश्मीर के राजपुरा से विधायक बशीर को सदन से बाहर लेकर जा रहे थे तो पीडीपी के अन्य विधायक भी आसन के समीप पहुंच गये. शोर-शराबे के बीच विधानसभा अध्यक्ष ने उन सदस्यों को भी सदन से बाहर किये जाने का आदेश दिया.  जब मार्शल उन्हें हटा रहे थे तो पीडीपी विधायक बशीर ने अचानक एक मार्शल का कॉलर पकड़ा और उसे तीन बार थप्पड़ जड़ दिये.

अरविन्द केजरीवाल ने सत्ता छोड़ते हुए कहा था कि दिल्ली की विधायिका को अभी आजादी नहीं मिली है, केंद्र में आज भी अंग्रेज राज कर रहें हैं जो कहते हैं आप अधिकार से नहीं हमारी अनुमति से काम करोगे. 
अरविन्द केजरीवाल ये भूल गए कि उन्हें इतना बोलने की आजादी मिल गयी यही आजादी की बड़ी सौगात है.इधर देखिये कश्मीर विधान सभा में एक माननीय विधायक जी मार्शल को थप्पड़ पे थप्पड़ मारे जा रहें हैं और मार्शल जो सरकारी कर्मचारी है चुपचाप सिर झुकाये थप्पड़ खाये जा रहा है. इसे कहते हैं गुलामी. ये किसी एक राज्य के सरकारी कर्मचारी की व्यथा नहीं है ये पूरे देश का हाल है .आप जानते हैं गुलाम की पीड़ा क्या होती है ? कभी इन बेजुबान गुलामों के दिल से पूछकर देखिये जिसे सड़कछाप गुंडा भी मंत्री बनते ही बेइज्जत कर देता है .कुछ ऐसा ही आपके मंत्री ने भी किया था कि नहीं जब एक दारोगा को सरे आम धमकाया था और दारोगा ने मर्यादा में रहने के लिए कहा था ? यह बदव्यवहार हर पार्टी के कारिंदे करते हैं चाहे वो चुने हुए जन प्रतिनिधि हों या पार्टी पदाधिकारी .
मुद्दे की बात यह है कि सन सैंतालीस में लाल किले से अर्ध रात्रि में जिस आजादी का ऐलान किया गया था वो देश के हर आदमी तक भी पहुंची है या उसे जिसका जितना बस चल उतना ले उड़ा है ? मैं समझता हूँ वह शेष देशवासियों के हिस्से में चाहे जितना आयी हो लेकिन सरकारी कर्मचारियों के हिस्से में बिलकुल नहीं आयी है .वो आज भी उन्हीं नियमों कानूनों से बंधा है जो गुलामों के लिए अंग्रेजों ने बनाये थे . आजादी सबका हक़ है वो सबको मिलनी चाहिए .क्या कोई पार्टी कोई नेता यह हक़ देगा ?

  मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हमारे माननीय प्रतिनिधि आपस में कैसा व्यवहार करते हैं ? वे आपस में खूब जूतम पैजार करें इसका उन्हें हक़ है . लेकिन वो किसी कर्मचारी के साथ बदतमीजी करें यह तकलीफदेय  है. ऐसा बर्ताव  गुलामों को उनकी गुलामी का अहसास कराने के लिए किया जाता  है. आप को याद दिलाना चाहूँगा कि विधायक जी को समुचित मान न देने के कारण उ०प्र ० की विधान सभा ने सदन में तलब कर  सम्बंधित अधिकारी से माफ़ी मंगवाई थी. दूसरी तरफ अनेक ईमानदार अधिकारी मंत्रियों और विधायकों को वांछित रकम न पहुंचाने या उनके मनमाफिक कार्यवाही न करने के कारण शारीरिक और मानसिक रूप से इस हद तक उत्पीड़ित किये गए हैं कि उनकी असमय मौत हो गयी.हर राज्य में हर सरकार में ये हादसे हुए हैं .ये इसीलिए हुआ है क्यूँकि सरकारी कर्मचारियों को न तो व्यवहारिक रूप से वोट देने का अधिकार दिया गया है न अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है,  न पद पर रहते हुए चुनाव लड़ने का धिकार है, न राज्य सभा या विधान परिषद् में उनका कोई प्रतिनिधि चुना  या नामित किया जाता है .जबकि बाकी सारे देशवासियों को ये हक़ है. क्या ये आजाद देश के आजाद नागरिक की पहचान है या गुलाम की ?    
 मैं चाहता हूँ कि जिस विधायक ने मार्शल को थप्पड़ मारें हैं कश्मीर की विधान सभा  उसे समचुित  दंड दे  या विधायक को मार्शल से थप्पड़ लगवाकर मामला रफा दफा कर दे .


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