मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

अभिव्यक्ति के अधिकार का दमन


          मध्यप्रदेश के उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा है कि 'दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल,' लिखने वाले गीतकार को घूंसा मारना चाहिए.'
      भाजापाई मंत्री को आपत्ति कवि प्रदीप की गाँधी भक्ति से है जो उन्होंने गांधीजी के अहिंसक आंदोलन को आजादी का श्रेय देकर व्यक्त की है .ध्यान देने की बात ये है कि कवि प्रदीप के गीत 'ए मेरे वतन के लोगों को' गाकर ही लता मंगेशकर पं० नेहरु को रुला गयी थी और इसी गीत को पिछले दिनों एक बड़े समारोह में नरेद्र मोदी की उपस्थित में उन्होंने गाया था.
यूँ भाजपाई मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की तरह और लोग भी कवि प्रदीप से 'बिना खडग बिना ढाल' के आजादी मिलने की बात से असहमत होंगें लेकिन किसी ने उन्हें घूसा मारने की बात न कही और न ही सोचा होगा. आखिर किसी बात से असहमत होना अलग बात है वो सबका अधिकार भी है लेकिन किसी से असहमत होने पर उसे घूसा मारने से कोई सहमत नहीं होगा. यह स्पष्टत: तानाशाही है और अभिव्यक्ति के अधिकार का दमन करना है. लेकिन संघी सोच अभिवयक्ति की स्वतंत्रता सहन नहीं करती है. कैलाश विजयवर्गीय का वक्तव्य इस तथ्य की इसकी पुष्टि करता है .और इसका प्रमाण गुजरात में कार्टूनिष्ट को दण्डित करके पहले दिया भी गया है.
   कवि प्रदीप के एक अन्य  गीत की इस पंक्ति से मैं भी असहमत हूँ जिसमें वे कहते हैं 'देखो मुल्क मराठों का ये जहाँ शिवाजी डोला था, मुगलों की ताकत को जिसने तलवारों पर तोला था.'
      एक तो महाराष्ट्र को मराठों का मुल्क बताकर क्षेत्रवाद को हवा दी जाती है दूसरी और मुगलों की ताकत को तलवारों से तोलने की बात कहकर उस नफ़रत के भाव को पुष्ट किया जाता है जो अंग्रेजों ने फूट डालों राज करो की अपनी नीति के तहत भारत का विकृत इतिहास लिखकर हिन्दू मुसलमानों के बीच विग्रह पैदा करने के लिए किया था तथा जिसका परिणाम पाकिस्तान के रूप में दुनिया के सामने आया था. मुगलों की यह ताकत तो अंग्रेजों के खिलाफ यह कहकर लड़ी थी कि 'गाजियों में बू रहेगी जब तलाक ईमान की ,तख्ते लन्दन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की.' लेकिन कवि प्रदीप ने मुगलों की तलवारों की ताकत को इस रूप में याद न करके उसे तुच्छता ही की दृष्टि से देखा है. बहरहाल सबका अपना अपना नजरिया होता है उससे कोई सहमत हो सकता है कोई असहमत हो सकता है उस पर वाद विवाद की जरुरत हमेशा हो सकती है इसकी गुंजायश भी रहनी चाहिए लेकिन किसी को घूसा मारकर कुछ बोलने से नहीं रोका जाना चाहिए.जो ऐसा करते हैं वो हमारे संविधान द्वारा दिए गए अभिव्यक्ति के अधिकार के अपहरणकर्ता समझे जाने चाहियें और अगर हमें अपने इस अधिकार की रक्षा करनी है और अपने देश की लोकतांत्रिक मर्यादाओं की रक्षा करनी है तो ऐसे लोगों को देश की राजनीति में प्रभावी होने से रोकना चाहिए .कुछ दिनों में जनता के सामने यह तय करने का वक्त आने वाला है कि वह देश में कैसा माहौल चाहती है? स्वतंत्रता से सर उठाकर चलने वाला या खौप से सर झुकाकर चलने और सत्ताधीशों की हाँ में हाँ मिलाने वाला ?


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