शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

हम लाल हैं

अगर हम लाल हैं तो गैरों के कारण है अपनों ने तो हमारे लाल खून को भी पानी समझा है. वैसे उनके किये धरे भी क्रान्ति का एक ढेला नहीं सरका है. अब कुछ नवक्रांतिकारी वानर उछाल मार रहें हैं लेकिन वो भी बचे खुचे दरख्तों की डालियाँ तोड़ने को ही क्रान्ति समझते हैं. लेकिन वे ऐसा समझते हों तो समझते रहें हमें उनसे लाल पीले होने का सर्टिफिकेट नहीं लेना है. जब मठाधीशों से सर्टिफिकेट नहीं लिया तो उनसे भी किसी तरह की कोई अपेक्षा नहीं है.-+
जिन वामपंथियों की अम्मा जयललिता और बहिन मायावती हो, जिनके लिए अम्बेडकर मार्क्स से बड़े मुक्तिदाता हों, जो जातिगत आरक्षण को व्यवस्था परिवर्तन का मन्त्र समझते हों ऐसे वामपंथियों का साथी होने से अच्छा एकला चलना है. हमें झंडे डंडे थमाकर जो ऐसी राजनीति करना चाहते हैं उनका साथ देने से अच्छा केजरीवाल जैसे जनूनी लोगों को सपोर्ट करना है, चाहे वे अराजकातवादी क्यूँ न हों ?

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें