रविवार, 9 फ़रवरी 2014

मजबूत राष्ट्रीय एकता के कठिन सवाल











 
जलते घर को देखने वालों, फूस का छप्पर आपका है,
आपके पीछे तेज़ हवा है, आगे मुकद्दर आपका है,
उस के क़त्ल पे मैं भी चुप था, मेरा नम्बर अब आया,
मेरे क़त्ल पे आप भी चुप है, अगला नंबर आपका है.

      पर्वोत्तर के लोगों के साथ नस्लीय भेदभाव कि इस घटना से  ये महसूस हो रहा है कि उनके लिए भी किसी अम्बेडकर का होना जरूरी है.जब  तक  स्वयं के समाज से कोई प्रबुद्ध विचारक अपने सामज के लोगों के लिए सम्पूर्ण समर्पण के साथ उनका नेतृत्व  करने के लिए खड़ा नहीं होगा तब तक शायद  कोई दूसरा उनकी  पीड़ा को नहीं समझ सकता है. हमारे देश में जाति और धर्म के भेदभाव को लेकर हाय तौबा मचती रहती है और उसे सुना भी जाता है क्योंकि वह देश विभाजन के दृश्य दिखा चुकी है.उन धर्मों और जातियों के  सक्षम नेतृत्व ने उन्हें  निडर होकर जीना सिखा दिया है .वो संगठित भी हैं और राजनति की दिशा को तय करने वाले प्रबल वोट बैंक भी. उन्होंने जिन्ना और अम्बेडकर जैसे नेता पैदा किये हैं जिन्हें देश का बड़े से बड़ा नेता भी नजअंदाज नहीं कर सकता था. लेकिन पूर्वोत्तर के लोगों की त्रासदी ये है कि वे संगठित  होकर इस हद तक नहीं गए कि देश छिन्न भिन्न हो जाए .उन्होंने इरोम शर्मीला को जन्म दिया है जो बारह तेरह बरस से अपने लोगों के संवैधानिक हक़ के लिए गांधीवादी तरीके से भूख हड़ताल पर है .लेकिन उसकी कौन सुनता है? यद्यपि इसी क्षेत्र में फिजो और लाल डेंगा जैसे अलगाववादी नेता भी हुए हैं जिन्होंने सशस्त्र संघर्ष के द्वारा भारत  से अलग होना चाहा लेकिन वे सम्पूर्ण  पूर्वोत्तर भारत का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे. उन्हें जन समर्थन भी एक सीमा से अधिक प्राप्त नहीं था. इसलिए अंतत: उन्हें भारत के संविधान को स्वीकार करना ही पड़ा .लेकिन आज समस्या ये है कि भारत के संविधान में आस्था रखने वालों इन लोगों को देश की मुख्यधारा के लोग ही अलग होने का एहसास करा रहें हैं .यही नहीं उन्हें उत्पीड़ित कर रहें हैं. फिर भी ये लोग कश्मीर से कन्याकुमारी और चौपाटी से गोहाटी तक के भूभाग के भारत होने का दावा करते हैं [ गोहाटी से आगे का इलाका इन्हें फालतू की  जमीन लगती है और उसे हैरत से आँखें फाड़ फाड़ कर देखते हैं ] कुछ इतिहासविद जरूर कृष्ण के मणिपुर की रुक्मणि से और अर्जुन के चित्रांगदा से विवाहित होने की याद दिलाकर इसे भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा बताते रहते हैं लेकिन वे ये नहीं बताते  कि पूर्वोत्तर के बेटियों के साथ अपने यहाँ  ऐसा  अमानवीय व्यवहार क्यों करते हैं ? मणिपुर की लड़की के साथ छेड़खानी हो या अरुणाचल के लडके की हत्या  उनके साथ  संगठित उसके खिलाफ  उसी तरह आवाज  क्यूँ नहीं उठाते हैं जैसे वे दलितों के उत्पीड़न या अल्पसांख्याकों के उत्पीड़न के खिलाफ उठाते हैं ? वो संगठन भी जो अपने अपने समुदाय के लिए लड़ते झगड़ते हैं और राजनीतिक सहूलियत के लिए साझा मोर्चा भी खड़ा करते रहते हैं वे क्यूँ नहीं नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाते हैं जबकि राष्ट्रीय एकता के लिए यह सबसे जरूरी काम है. क्या  सिर्फ अपने अपने जाति सम्प्रदाय वालो के लिए लड़ेंगे और ये भी कहेंगे की हम सब भारतीय एक हैं .ऐसे तो राष्ट्रीय एकता नहीं हो सकती  है.राष्ट्रीय एकता कोई नारे लगाने से होने वाली नहीं है न ही वो भारत माता की जय बोलने होगी उसके लिए भारत के जनगण मन की हर हाल में एक होना होगा. दामिनी काण्ड में हम भूलें नहीं है की किस तरह सिक्किम की एक लड़की पाओलीन अचेत पुलिस कर्मी को अस्पताल लेकर गयी वो भी तब जब उसके साथी और अफसर उसे जमीन पर पीडीए हुआ छोड़कर आगे बढ़ गए थे. क्या दिल्ली के लोगों को नीडो हत्याकांड के विरोध में ऐसी ही एकजुटता नहीं दिखानी चाहिए ?सबसे बड़ी  दिक्कत ये  है की दिल्ली के चारों और के लोग ही स्वयं को पूरा हिंदुस्तान समझते हैं .उन्हें सीमान्त प्रदेशों के लोगों से कोई ख़ास मतलब नहीं है ,वे उनके लिए अजूबा हैं .उनका खाना पहनना हँसना बोलना सब उनके लिए मनोरंजन और घृणा की वस्तु हैं लेकिन    कोई कश्मीरी  हो या मणिपुरी बंगाली हो या मलियाली हम सब भारतीय हैं .और हममें से स्वयं को ही  हिंदुस्तान कहने और समझने वालों की यह पहली जिम्मेदारी है कि वह इन सीमान्त प्रदेश के बासिंदों को अपना भाई समझे और उन्हें वही अधिकार और  सम्मान दे जो एक भाई को दूसरे भाई से मिलना चाहिए. लेकिन यहाँ तो भाई की परिभाषा भी  बदल गयी है. अब भाई का मतलब दाउद और छोटा शकील हो गया है. पूर्वोत्तर के लोगों की दिक्कत ये है कि वे अभी भी भाई को भाई समझते हैं और देश की मुख्य भूमि के लोगों को बड़े भाई का सम्मान देते हैं . गलत वो नहीं गलत हम हैं. खोट हमारे दिलों में है . इससे पहले की वो भाई को अंडरवर्ल्ड से जाने और समझें  हमें स्वयं को सुधार लेना चाहिए .नहीं तो सीमान्त प्रदेशों के बासिंदों की कोई गरज  नहीं है कि वे अपने पड़ौसी को छोड़कर हजार किलोमीटर दूर वालों  से भाईचारे का नाता निभाएं .देश को एक रखने  की जितनी जिम्मेदारी उनकी है उससे ज्यादा जिम्मेदारी हमारी है.  हमें कहना चाहिए --------


यकीन हम पे तुम करो तुम्हारे साथ हैं खड़े
तुम्हारे साथ हैं हमारे दोस्तों के सब धड़े .
तुम्हें करें जो तंग अगर या देखते हों बद नजर
उन्हें करेगें ठीक हम वो चाहे जितने हो बड़े.
यह देश है हमारा गर, ये देश है तुम्हारा भी
उन्हीं का देश है नहीं दिलों में जिनके फांस है
   
     -----------   अमर नाथ 'मधुर'  

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