शुक्रवार, 14 मार्च 2014

खराब और अच्छे लोग


एक ओर मैं मैं की रट है एक और हम हम का शौर 
आप आप कहने वाले भी हैं उन पर भी करना गौर .
आम आदमी को ही अब ये धर्म युद्ध लड़ना होगा 
जीतेगें तो जान बचेगी हारे नहीं मिलेगा ठौर .
    क्या सारे राजनेता खराब हैं ? क्या सारे नौकरशाह खराब हैं ? क्या सारे व्यापारी खराब हैं ? नहीं हैं. कभी भी कहीं भी न सारे लोग खराब होते हैं और न अच्छे होते हैं .सब जगह कुछ लोग अच्छे होते हैं और कुछ खराब होते हैं .लेकिन मिडिया के लोग देवता होते हैं .उनमें कोई खराब नहीं होता है. वो सबको एक सिरे से खराब घोषित कर सकते हैं लेकिन उनमें से किसी पर कोई सवाल नहीं उठा सकता है .आप सवाल करें आप कहें कि जो मीडिया के लोग बिके हुए हैं उनके खिलाफ जांच होनी चाहिए  और जांच में दोषी पाये र उन्हें जेल भेजा जाना चाहिए तो सारा मीडिया आपके खिलाफ लाम बंद हो जायेगा .वो बिना किसी औचित्य के आपके खिलाफ मीडिया को धमकाने का आरोप लगाएगा और आपको तानाशाह घोषित कर देगा . क्यूँकि वो देवलोक वाले  हैं . क्यूँ भाई अभी कुछ ज्यादा वक्त तो नहीं हुआ जब एक मीडिया चैनल वाले  जिंदल से पैसा वसूल करने के जुर्म में जेल गए थे ? अब अगर केजरीवाल ऐसे लोगों को जेल भेजने की बात कह रहें हैं तो क्या गलत कह रहें हैं ? उन्होंने उन पत्रकारों को तो जेल भेजने की बात नहीं कही जिन्होंने दामिनी के दर्द को बयान किया था ? उन्होंने उन पत्रकारों को भी जेल भेजने के लिए नहीं कहा जो सोनी सोरी या इरोम शर्मीला की पीड़ा को स्वर देते  हैं. मीडिया के बहुत से लोगों को ये भ्रम रहता है कि टी वी चैनल और अखबार नेता बनाते हैं या वही इलैक्शन जिताते हैं. लेकिन उन्हें ये याद रखना चाहिए कि आज भी भारत का आम आदमी ना अखबार पढ़कर वोट देता है और ना ही टी वी चैनल देखकर अपनी राय बनाता है. वो अपनी राय अपने रोजमर्रा के तजुर्बे से बनाता है जो उसे राजनेताओं के कार्य और व्यवहार से हासिल होता है या नौकरशाही से उसके वास्ते से उसे मिलता है. दुर्भाग्य से दोनों से उसे कुछ अच्छा अनुभव नहीं मिल रहा है. इसलिए वो इस व्यवस्था में बदलाव चाहता है . वो चाहता है कि एक ऐसी व्यवस्था हो जो ईमानदारी के साथ उसे बुनियादी सुविधाएं दे ताकि वो सकून से अपनी जिंदगी बशर कर सके . अरविन्द केजरीवाल  में वो इसे पूरा करने की चाहत देख रहा है .आज अरविन्द केजरीवाल आम आदमी की आशा आकांक्षाओं का प्रतीक बनकर उभरा है. इसलिए जो कोई इस प्रतीक के साथ छेड़छाड़ करेगा जनता उसे बर्दाश्त नहीं करेगी. आज  आम आदमी क़ी तरफ से मीडिया के मठाधीशों के लिए यह एक चेतावनी  है कि वे किसी नेता के  बिगुलवादक का काम ना करें केवल जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए सच्चे पत्रकारिता धर्म को निभायें और अगर पत्रकारिता के नाम पर केवल व्यवसाय भी कर रहें हैं तो व्यवसायिक ईमानदारी का निर्वाह करें. अगर कदाचार करें तो क़ानून के अनुसार दंड भोगने के लिए तैयार रहें और क़ानून तोड़ने वाले का मिडिया कर्मी या संस्थान का साथ ना दें. आखिर एक व्यापारी भी किसी चोरबाजारी के पकड़े जाने की इतनी निर्लज्ज्ता से हिमायत नहीं करेगा जितनी मिडिया के लोग करना चाहते हैं .
 एक दलील ये दी जाती है कि मीडिया को बाहर से नियंत्रित ना किया जाए मीडिया स्वयं अपना नियमन करेगा . यह भी स्वयं को विशिष्ट समझने का अहं है और कुछ नहीं है .आत्मावलोकन और नियमन तो हर अंग को स्वयं करना ही चाहिए वो चाहे सरकार हो, न्याय पालिका हो ,नौकरशाही हो या फ़ौज हो .लेकिन अगर कोई अन्य वैध  एजेंसी भी कानूनी कार्यवाही करे तो उसके साथ सहयोग किया जाना चाहिए और उसके निष्कर्ष को सहज स्वीकार भी करना चाहिए या उसकी उचित स्तर पर पुन: विवेचना  के लिए जाना चाहिए ना कि स्वयं ही आरोपी सवयं ही वकील और स्वयं  ही न्यायाधीश बन कर मामले को ख़त्म कर देना चाहिए .बहरहाल अरविन्द केजरीवाल ने जो कहा वो उनके रफ और टफ लहजे के बावजूद पूरी तरह सही है और भारत का आम आदमी उनके इस बयान से सहमत है.       

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