रविवार, 16 मार्च 2014

होली का उत्सव


 
  होली का उत्सव जहाँ बहुत सी खूबियों के कारण अच्छा लगता है वहीँ ये भी याद आता है कि यह मुख्यत: प्रहलाद की बुआ होलिका के अग्नि में जलाये जाने का दिन है. होलिका को अग्नि में दहन किये जाने का  उत्सव मनाने का  तत्कालीन हेतु चाहे जो रहा हो वो एक कबीलाई प्रथा के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता है.  हत्या के बाद उत्सव की  इस क्रूर कबीलाई प्रथा का महिमा मंडन कोई सभ्य समाज नहीं कर सकता है .लेकिन हमारे यहाँ यह महिमामंडन होता है और सदियों से होता रहा है . किन्तु किसी कुप्रथा को सिर्फ इसलिए नहीं सराहा जा सकता है कि वह सदियों पुरानी है. साथ ही बधाईयों का आदान प्रदान तो बिलकुल समझ से परे है .क्या किसी को मोहरर्म की बधाई देते सुना है ? अगर होलिका शत्रु भी थी और उसके दहनकर्ता हमारे आदर्श थे जो कि नहीं थे तब भी किसी की मृत्यु  को याद करके बधाईयां तो नहीं दी जाती हैं .अगर ये उत्सव और बधाईयाँ प्रहलाद के बच जाने की है तब भी होलिका के हश्र को याद कर उत्सव नहीं होना चाहिए . यूँ हमारे बहुत से त्यौहार हैं जो किसी न किसी शत्रु के वध से जुड़ें हैं लेकिन होली एक स्त्री केजिन्दा जलाये जाने  की कथा है. राजस्थान में किंवदत्ती है कि होलिका अपने स्वछन्द प्रेम के कारण हिरण्यकश्यप द्वारा छल पूर्व जलायी गयी थी. किसी को उन्मुक्त प्रेम की सजा देने का यह बर्बर तरीका बहुत पुराना है.  लेकिन बाद में इस पर अफसोस का दिखावा किया जाता है.इसलिए  बधाईयाँ देने का चलन कुछ ठीक  नहीं लगता है .     

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