बुधवार, 19 मार्च 2014

चुनाव का मौसम

  चुनाव का मौसम  है  और  राजनीतिक परिन्दें  अनुकूल  वातावरण  की ओर  उड़ान  भर  रहें  हैं. इतनी  चें चें  मची  है  कि कुछ  समझ  ही  नहीं आ  रहा  है  कि कौन  क्या कह  रहा  है?  अगर  न्यूज  चैनल  इनके   आज  और कल  के बयानों  को आमने  सामने  रखकर  एक साथ प्रसारित  कर  दें  तो  एक  कम्पलीट  डिबेट  हो  जायेगी . पक्ष  विपक्ष  के किसी अन्य नेता की जरुरत ही नहीं पड़ेगी .नेताजी  के बयान  ही  दोनों  तरफ की  मोर्चेबंदी और हमले को अंजाम देंगे .  जनता गिरगिटों को पहचानती है लेकिन इन नेताओं को पहचान  और पहचान  इन्हें  सबक  सिखाना  खसा  मुश्किल  काम  है .यूँ  मुश्किल  नेताओं के लिए भी कुछ कम  नहीं है . बड़े  बड़े  कद्दावर  नेता जिनका  रात  दिन  का यही दावा  है कि अगली  सरकार  हमारी  बनेगी , स्वयं  अपनी जीत के प्रति  आश्वस्त  नहीं हैं .उन्हें डर  है कि  कहीं ऐसा  न हो कि  सरकार  तो उनकी पार्टी की बन  जाए  लेकिन वो स्वयं  चुनाव हार जाएँ तो फिर वे तो कहीं के न रहेंगे. क्योंकि वे जानते हैं कि भले ही लोह पुरुष हों या विकास पुरुष अगर अपना चुनाव ही हार गए तो पार्टी दूसरे नेता की ताज पोशी करने में देर नहीं करेगी. यूँ भी पार्टी के तहखाने में बहुत बड़ा गोदाम है जिसमें उन्हें धकेल दिया जाएगा और फिर उनका हाल पूछने कोई नहीं जाएगा. इसलिए कुछ लोग अपनी जगह से धकियाये जाकर भी चुनाव की रेस में बने रहना चाहते हैं . जिनकी थोड़ी बहुत भी चल रही है वो सुरक्षित सीट तलाश रहें हैं और ज्यादा सुरक्षा बरतते हुए एक साथ दो दो सीटों से चुनाव लड़ रहें हैं .कुछ लोग न चाहते हुए भी दूसरी जगह से चुनाव लड़ने के लिए इसलिए तैयार हो रहें हैं कि हो न हो लहर सुनामी में जीत ही जायें. अगर  नहीं भी जीते तो अपनी वफादारी और आज्ञापालन का हवाला देकर सत्ता में कुछ न कुछ पा ही लेंगे. लेकिन वो नहीं जानते ही की राजनीतिज्ञ सबसे बेरहम कसाई होता है वो जिससे खफा होता है उसे सांस लेने लायक नहीं छोड़ता है .इस चुनाव के बाद कुछ बूढ़े नेताओं का यही हाल होने वाला है .
 यहाँ एक सवाल यह भी उठता है कि जब इन बड़े कद्दवार नेताओं को अपने जीतने में इतना संशय  है तो फिर ये अपनी सरकार बनाने के प्रति इतने आश्वस्त कैसे हैं ? क्या ये सिर्फ जनता के सत्ता विरोधी क्षोभ  में ही अपनी विजय देख रहें हैं ? अगर ऐसा है तो फिर इन्हें  नमो सुनामी के झूठ तूफ़ान को नहीं फैलाना चाहिए. जनता दोनों प्रमुख दलों के शासन का अनुभव रखती है और बहुत संभव है कि वो अपने अनुभव से सीख  लेकर दिल्ली विधान सभा चुनाव जैसा फैसला करने का मन बना रही हो. कोई जरुरी  नहीं कि जनता खाई से बचने  के लिए कुए  में कूद  जाए. वो दोनों को मिटटी से पाट सकती है. जनता की ताकत बहुत बड़ी है उसे बड़ो बड़ों को जमींदोज करना आता है . देश का आम आदमी एक खामोश इंकलाब के लिए उठ रहा है. देश को ये आम आदमी ही बचाएगा कोई  छोटा  बड़ा सरदार नहीं बचाने वाला है .

          पूरे दस साल तक  जो प्रधान मंत्री को कमजोर   पी   एम्   बताता   रहा   जिसने   मनमोहन   सिंह   को मौन मोहन  कहकर उसका मजाक उड़ाया   आज   उससे   ज्यादा   कमजोर   और   बेजुबान   राजनेता   दूसरा कोई नहीं है . बेचारा  लौह  पुरुष  न  अपनी  मर्जी  से उठ  सकता  है न  बैठ  सकता  है. राजनीति में जिसका सब लोहा मानते थे उसके उस  लोहे को  जंग  खा  गया   है.आज वह  गैरों  के  धकियाकर  गिराने  से पहले   ही अपने  के हाथों  कबाड़ा बना दिया जाने के हालात में पहुंच गया है. उसके मन में यही भाव आता होगा

हे राम क्षमा करना मुझको मैं मर्म समझ न पाया था,
स्वारथ वश तेरा नाम लिया जन गण मन को भरमाया था.
मैं राजनीति में रावण  से भी ज्यादा ज्यादा कुशल मानता था,
पर मेरा उससे अंत बुरा ये भी  मैं कहाँ जानता था ?    

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