गुरुवार, 20 मार्च 2014

'मुझे अमेरिका जाना है'-Abdul H Khan


 मुख्मंत्री जी ने मचलते हुए कहा। 'नहीं, पहले आपको दिल्ली जाना चाहिए'- भक्तों ने एक स्वर से गुहार लगाई। लेकिन-एक शंकालु भक्त ने डरते-डरते शंका उठा ही दी- 'लोग कहते हैं कि दिल्ली तो दूर है'। 'वह सिर्फ कहावत है' -भक्तों ने उसे हड़काया। 'नहीं, किसी सूफी की बद्दुआ है'- किसी और धर्मभीरु भक्त ने शंका को और गहरा कर दिया। किसी सूफी की बद्दुआ के नाम से एक और धर्मभीरु भक्त बहुत डर गया था- 'यह बद्दुआ कहीं वली गुजराती की तो नहीं, क्योंकि गुजरात दंगों के समय उन्हीं की मजार पर तो रोड रोलर चलाया गया था।' खुसुर-पुसुर होने लगी। किसी ने यह कह कर माहौल को हल्का करने की कोशिश की कि 'सूफी बद्दुआ नहीं दिया करते।' फिर भी माहौल में शंकाओं को इस तरह उगता देखकर एक परम भक्त ने सुर बदला- 'देखिए, आपको दिल्ली ही जाना चाहिए।' लेकिन मुख्मंत्री जी अभी यह हिसाब लगा ही रहे थे कि दिल्ली वाया अमेरिका जाना चाहिए या अमेरिका वाया दिल्ली जाना चाहिए, कि एक और परम भक्त ने अपने नंबर बनाते हुए कहा- 'हमारे गुजराती व्यापारी भाई भी पहले अमेरिका ही जाते हैं, दिल्ली कौन जाता है, मुख्मंत्रीजी को पहले अमेरिका ही जाना चाहिए।'

'दिल्ली तो मुझे जाना ही है, वहां जाने से मुझे कौन रोकेगा'- मुख्मंत्रीजी ने अपना छप्पन इंच चौड़ा सीना फुलाते हुए कहा। 'और क्या'- एक और भक्त ने हां में हां मिलाई- 'दिल्ली कोई पटना थोड़े ही है कि नीतीश जी रोक लेंगे।' मुख्मंत्री जी कह रहे थे- 'मैंने तो कभी अमेरिका की बुराई भी नहीं की।' भक्तों ने हां में हां मिलाई- 'ठीक बात है जी, अमेरिका कोई कांग्रेस थोड़े ही है, गांधी-नेहरू परिवार थोड़े ही है कि आप उसकी बुराई करेंगे।' 'अमेरिका की क्या'- एक अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों के जानकार ने कहा- 'आपने तो कभी इस्राइल की भी बुराई नहीं की बल्कि उसे तो आदर्श मानते हैं। फिर चाहे इस्राइल फिलिस्तीनियों को खत्म कर ही दे, क्या फर्क पड़ता है, पर किसी इस्राइली को वीजा से इंकार नहीं किया जाता और आपको बस एक दंगे के लिए वीजा नहीं दिया जा रहा। यह अन्याय है।'

एक अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार भक्त ने भी मौका देखकर अपनी नाक घुसाई- 'पर अमेरिका को वहां यहूदियों की बड़ी जरूरत है।' 'तो क्या हमारे गुजराती व्यापारी भाइयों की नहीं'-पहले वाले भक्त ने सवाल खड़ा किया। क्योंकि यह इटली का मामला नहीं था इसलिए मुख्मंत्रीजी ने इस बहस में कोई रुचि नहीं दिखाई। वे अभी भी वीजा न मिलने पर अफसोस प्रकट कर रहे थे। एक भक्त ने आक्रोश व्यक्त किया- 'हमारे गुजराती व्यापारी भाई भी पता नहीं वहां क्या रहे हैं।'
  बात क्योंकि फिर गुजराती व्यापारी भाइयों पर आ गई थी सो एक व्यापारी भक्त ने कहा- 'नहीं उन्होंने बहुत किया है और कर रहे हैं। उन्होंने ही वॉर्टन में मुख्मंत्री जी का भाषण करवाने का जुगाड़ किया था, पर इन सेकुलरवादियों ने सब गड़बड़ कर दिया। फिर भी उन्होंने वीडियो कांफ्रेंसिंग तो करवाई। और अब देखिए आठ-आठ लाख रुपये देकर अमेरिकी सीनेटरों को मुखसे मिलने के लिए भेजा। बदले में उन्होंने वीजा दिलाने का आश्वासन दिया।' इस पर एक भक्त बहुत उत्तेजित हो गया- 'इतने में तो यहां का कोई एजेंट भी वीजा दिला देता। क्यों इतना पैसा खर्च किया?'

'पर यह आठ लाख रुपये देने की बात किसने फोड़ी'- एक भक्त बहुत उत्तेजित हो गया था। 'ऐसी गड़बड़ ये मीडिया वाले ही करते हैं'- एक दूसरे भक्त ने हिकारत से कहा। 'पर मुझे अमेरिका जाना है'- मुख्मंत्रीजी फिर मचल पड़े। 'जी इसका तो एक ही तरीका हो सकता है'- अंतर्राष्ट्रीय मामलों के उस जानकार भक्त ने फिर कमान संभाली- 'हमारे गुजराती व्यापारी भाइयों को अमेरिका में अपनी हैसियत कुछ-कुछ वैसे ही बनानी होगी जैसी वहां के यहूदियों की है। फिर जैसे वे इस्राइलियों पर उंगली नहीं उठा सकते वैसे ही आप पर भी उंगली नहीं उठा पाएंगे।' 'इससे तो अच्छा है जी कि आप दिल्ली चले जाओ जी'-एक और भक्त ने थोड़ी दृढ़ता के साथ कहा- 'वहां पहुंच गए तो फिर अमेरिका जाना आसान हो जाएगा।' 'पर दिल्ली पहुंचना भी कहां आसान है'- 'और मुझे अमेरिका जाना है।'
                                              ( संकलित )

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