रविवार, 23 मार्च 2014

क्रीमिया

एक जनमत संघ द्वारा बहुसंखयक रसियन भाषी आबादी वाले क्रीमिया  ने यूक्रेन से अलग होकर रूस में शामिल होने के पक्ष में फैसला कर लिया है जिसे रूस ने तत्काल स्वीकृत करते हुए क्रीमिया  को अपने एक अलग प्रांत के रूप में मान्यता दे दी है .रूस सरकार के हवाले से खबर दी गयी है कि भारत और चीन ने उसका समर्थन किया है . भारत में लोक सभा चुनाव का जो हो हल्ला मचा हुआ है उसमें यह खबर दब गयी है .कोई नेता इस बारे में कुछ नहीं बोल रहा है.जबकि रूस का यह फैसला विश्व व्यापी असर डालने वाला है. दुनिया के अनेक देशों में चल रहे अलगाववादी आन्दोलनों को इससे बल मिलेगा. कश्मीर में पाक समर्थक अलगाववादी जोर पकड़ सकते हैं. इसलिए रूस के इस कदम को सही नहीं ठहराया जा सकता है. रूस और पश्चिमी देशों के बीच इस मसलें को लेकर तनातनी बढ़ गयी है.यूक्रेन कि अखंडता का सम्मान किया जाना चाहिए. अगर रसियन भाषी लोगों कि कुछ वाजिब शिकायतें हैं तो उन्हें यूक्रेन के अंदर ही व्यापक स्वायत्त देकर सुलझाया जा सकता है उसके लिए एक देश को दो हिस्सों में बांटना और फिर उसके एक हिस्से को भाषायी या जातीय समानता के आधार पर शक्तिशाली पड़ौसी द्वारा अपने में मिला लेना किसी भी तरह से जायज नहीं है. आखिर जो अल्पसंखयक यूक्रेनी क्रीमिया  के साथ रूस में शामिल होंगें उनकी भी तो कुछ न कुछ शिकायतें होंगी. क्या वो अपने देश से सिर्फ इसलिए जुड़ा हो जायेंगे कि क्यूंकि वे देश के उस हिस्से में रहते हैं जहां संयोग से वो अल्पसंख्यक हैं ? क्या रूस मुस्लिम बहुल दागिस्तान के बासिंदों को भी यह अधिकार देगा कि वह चाहें तो रूस में रहें और चाहें तो अलग हो जाएँ ? अगर रूस अपने अंदर इस सिद्धांत को लागू नहीं करता है तो उसे यूक्रेन में इस पर अमल करने का कोई अधिकार नहीं है. किसी देश की एकता अखंडता का सवाल उस देश के किसी ख़ास हिस्से को तय करने का नहीं होता है यह पूरा देश मिलकर कर सकता है.अगर इस तरह फैसले लिए जाने लगे तो छोटे देशों और समुदायों की स्वतंत्रता और एकता संकट में पड़ जायेगी.

  जब अफगानिस्तान में सोवियत सेनाओं ने कब्ज़ा जमा लिया था तो बहुत सारे कम्युनिष्ट खुश थे.उन्हें लगता था क्रान्ति का विस्तार हो रहा है लेकिन बहुत से कम्युनिष्ट ऐसे भी थे जिन्होंने उसका विरोध किया था. कवि गोरख पाण्डेय ने लिखा था ' इंकलाब की बातें करते युद्धों के मैदान में, रूसी सैनिक उतर पड़ें हैं अब अफगानिस्तान में.' वक्त ने सोवियत  रूस की इस  कार्यवाही को गलत साबित किया और इसकी उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी  उसके वजूद को ही ख़त्म कर दिया. हालाकि सोवियत   संघ के ख़त्म होने की ये एकमात्र वजह नहीं थी लेकिन एक बड़ी वजह थी.  खैर तब रूस के समर्थन की थोड़ी बहुत सही वजह हो सकती थी लेकिन आज कैसी कोई वजह नहीं है.  रूस  अब  कोई  कम्युनिष्ट  देश नहीं है फिर भी भारत में बहुत सारे कम्युनिष्ट रूस द्वारा क्रीमिया पर कब्जे का समर्थन कर रहें हैं. जिन क्रिमियाई रूसी भाषियों के जनमत संग्रह की बात की जा रही है वे वहाँ स्टालिन ने रूस से ले जाकर बसाये थे और वहाँ के तातारियों को जबरन बाहर ले जाकर बसाया गया था .आज रूस दावा करता है कि क्रीमिया हमेशा से रूसियों के दिल दिमाग में बसा रहा है.
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        जार   के साम्राज्य   को लेनिन   और स्टालिन ने समाजवादी  राज्य   में बदलने   का प्रयास  किया और समाजवादी एकता के नाम पर उसका विस्तार भी किया. स्पेन, फांस, ब्रिटेन, पुर्तगाल,  हालैंड सबके साम्राज्यों का अंत हो गया उपनिवेश आजाद हो गए लेकिन रूस का कब्ज़ा बना रहा.सोवियत संघ के भंग होने पर बहुत सारे देश स्वतंत्र हो गए. रूस जिसके कब्जे में आज भी बहुत से मुल्क हैं सोवियत काल के सारे देशों पर फिर कब्ज़ा करना चाहता है .इसकी शुरुआत क्रीमिया से हो गयी है. लेकिन उसकी ये हरकत उसे बहुत मंहगी पड़ेगी और सारी  दुनिया  को भी संकट में डाल देगी. इसलिए रूस पर नकेल कसना बहुत जरुरी है .उसके साथ सिर्फ इसलिए खड़े होना कि वह अमेरिका के खिलाफ थोडा बहुत बोल लेता है या वह तीसरी दुनिया के देशों का पूर्व साथी  है आज कोई मायने नहीं रखता है. अपनी स्वतंत्रता और एकता के लिए बड़े देशों की धोंस पट्टी का पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए नहीं तो हम अपने राष्ट्र की एकता को चुनौती देने वालों से लड़ने का नैतिक हक़ खो देंगे .   

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