रविवार, 30 मार्च 2014

साहब सगुन कुछ ठीक नहीं हैं.



       उन्नीस सो सतहत्तर का लोक सभा चुनाव याद आता है. कांग्रेस ने बागपत में सभा आयोजित कर स्व0 संजय गाँधी से सम्बोधित कराना तय किया. बागपत के लोग आपात काल और माया त्यागी काण्ड से बहुत नाराज थे. वे नहीं चाहते थे कि बागपत में संजय गांधी की कोई सभा हो. लेकिन संजय गांधी का रुतबा इतना बड़ा था कि प्रशासन हर कीमत पर संजय गाँधी की चुनावी सभा को सफल बनाने में जुट गया. कहते हैं कि पहली रात को किसानों ने पास के रजवाहे की पटरी को काट दिया जिससे उस मैदान में पानी भर जाए जिसमें सभा होनी थी . प्रशासन सारी कोशिशों के बाद भी उस मैदान में पानी भरने से नहीं रोक सका था. इसका परिणाम यह हुआ कि स्व० संजय गांधी की सभा रद्द करनी पड़ी.चुनाव परिणाम कैसे ऐतिहासिक रहे यह किसी को याद कराने की जरूरत नहीं है.
आज बागपत में भाजपा के पी एम् प्रत्याशी की चुनावी सभा थी.जब वो भीड़ को सम्बोधित करने के लिए खड़े हुए तो माईक मौन हो गया. साहब हैरान लेकिन माईक ने मौन तोड़कर नमो कहने से साफ़ इंकार कर दिया. पसीना पोंछा, आगे पीछे देखा, कहीं कोई आवाज नहीं.साहब माईक ठोकते रहे .कोई आवाज नहीं. साहब के चेहरे पे परेशानी झलकने लगी. छुटभैये नेता पानी का गिलास लेकर दौड़े.साहब ने पानी पिया.इस सब में पूरे दो मिनट हो गए तब जाकर माईक ठीक हुआ .इस बीच उनके समर्थक हर हर के नारे लगाते रहे. माईक ठीक हुआ तो नमो बोले 'सन अट्ठारह सौ सत्तावन में जनता ने भारत को अंग्रेजो से मुक्त करने की लड़ाई लड़ी थी और तब उसका सन्देश वाहक था कमल और रोटी.अब दो हजार चौदह में जनता कांग्रेस मुक्त भारत बनाएगी और उसका सन्देश है कमल और मोदी.'
अभी हप्ता भर नहीं हुआ जब कहा गया था कि व्यक्तिवाद को बढ़ावा नहीं दिया जाए लेकिन यहाँ तो पूरी शर्मो हया को ताक पर रखकर अहम् सर चढ़कर बोल रहा है.कौन जानता है कि इसका हश्र क्या होगा ?लेकिन हम इतना जानते हैं कि जिस कमल को दिखाकर वो इतिहास का आईना दिखा रहे हैं उन्हें उस आईने में ये साफ़ दिखायी देना चाहिए कि अट्ठारह सौ सत्तावन का संग्राम सत्ता परिवर्तन की जनाकांक्षाओं के बावजूद यौद्धाओं के उतावलेपन के कारण विफल ही रहा, इसलिए अति आत्मविश्वाश से ग्रस्त नेताओं और उतावले कार्यकर्ताओं के कारण अगर परिणाम आशा के विपरीत रहे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा.
इसीके साथ ये भी ध्यान रखना होगा कि बागपत की जनता ने जो सन्देश संजय गांधी को मैदान में  पानी भरकर दिया  कहीं वैसा ही सन्देश इस बार माईक बंद करके तो नहीं दिया  है ? यहाँ   ये   भी  याद   दिलाना    अनुचित   ना   होगा  कि    मोदी की मेरठ में रैली थी।अमित शाह ने 'एक नोट एक वोट' के नाम से रैली स्थल पर पचास डब्बे रखवाए थे।जिसमें लोग हैसियत के हिसाब से नोट डाल रहे थे। रैली से लौटते हुए लोग उन पचास डब्बों को उठा ले गए। क्या अभी भी  कुछ समझने समझाने  की   जरुरत   है ? समझने वाले समझ रहें हैं न समझे जो अनाड़ी है.

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