मंगलवार, 4 मार्च 2014

डी एन ए बैंक


बाप-बेटे पर विवाद का अंत?‍


















               
       एक  चुटकला याद आता है .कहते हैं एक रोज  बादशाह अकबर अपने महल की छत पर खड़े थे .उन्होंने  देखा कि पास में ही बह रही नदी में एक धोबी कपडे धो रहा है .वे उसे गौर से देखने लगे .उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि धोबी की शक्ल उनसे मिलती है . उनका मन धोबी को पास से देखने का  हुआ .उन्होंने धोबी को महल में बुलावा लिया .धोबी के सामने आने पर उन्होंने पाया कि धोबी वाकई हु ब हु उनकी शक्ल का है .उन्हें मजाक करने की सूझी उन्होंने धोबी से कहा -'क्यूँ भाई धोबी क्या आपकी माँ महल में कपडे धोने आती थी ?'
   धोबी ने कहा हजूर मेरी माँ नहीं आती थी महल में  मेरा बाप  कपडे लेने देने आता था.
        ऐसे बहुत से लोग हो सकते हैं जिनकी वास्तविक पहचान को लेकर भ्रम होता  है. बहुत से लोग स्वयं ही अपनी पहचान को लेकर परेशान रहते हैं ऐसी ही पहचान के सवाल से परेशान रहने वाले शख्श का नाम 'रोहित शेखर' है . 'रोहित शेखर' हमारे समाज में  बिना पिता  के  नाम के  अपनी पहचान के लिए जूझ रहे  लोगों कहानी का नाम है. रोहित शेखर ने लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद एन० डी०तिवारी को मजबूर किया कि वो उसे अपने पुत्र के  रूप में सार्वजनिक रूप से स्वीकार  करें. इससे कई सवाल खड़े हो रहें हैं .पहला सवाल तो यही है कि क्या अन्य  रोहित शेखर अपने इस अधिकार के लिए नहीं खड़े होंगे जो कि उन्हें होना भी चाहिए ? आखिर एन० डी०  तिवारी के वो इकलौते पुत्र तो होंगे नहीं, ऐसे और भी होंगे जो उन्हें अपना पिता साबित कर सकते हैं . दूसरे क्या अन्य राजनेताओं और अन्य मशहूर लोगों पर भी यह संकट नहीं आएगा कि वो अपनी गैर पारिवारिक संतानों को पिता का नाम  प्रदान करें ? क्या मशहूर लोगों के अलावा जन साधारण में ऐसी मिसाल न होंगी ? क्या उनके लिए भी अधिकार प्राप्ति का यह मार्ग उचित न होगा? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि एन डी तिवारी के पास अकूत संपत्ति न होती तो क्या रोहित शेखर उन्हें अपना पिता माने जाने के लिए लड़ते ? मुझे नहीं लगता कि अगर उनका पिता कोई गरीब असहाय व्यक्ति होता तो वो इस लड़ाई को शुरू भी करते .आज ऐसी घटनाओं की भरमार है जहाँ ऐश्वर्य में डूबे बेटों ने अपने बूढ़े माँ बाप को बेघर कर दर दर की ठोकरे खाने को मजबूर कर दिया है .घरों के अंदर ही बूढ़े माँ बाप की उपेक्षा और अपमान तो आम बात है .इसलिए वक्त की जरुरत तो यही है कि अमीर गरीब के भेदभाव के बिना बूढ़े लोगों को सरक्षण दिया जाए .एक नौजवान से अपेक्षा की जाती है कि वो अपनी पहचान अपने हुनर से बनाये  अपने पिता या खानदान का सहारा न ले .लोग कह सकते हैं कि बाप की पहचान के बिना समाज में जीना  बहुत अपमान भरा होता है. यह मनुष्य को कुंठित कर देता है उसके अंदर पूरे समाज के प्रति नफ़रत जड़ जमा लेती है .लेकिन ये तो पितृसत्तामक सामाजिक व्यवस्था के कुपरिणाम है. अत: जरुरत इस सामाजिक व्यवस्था  को बदलने की है जो व्यक्ति कि पहचान के लिए उसके पिता के नाम का होना जरुरी समझती है. वरना अगर यह पहचान जरुरी  है तो सरकार को चाहिए की वह हर नागरिक का डी एन ए लेकर देश में  डी एन ए  बैंक स्थापित करे ताकि कोई भी जरुरत मंद आदमी अपने डी एन ए का मिलान कर अपने   पैतृक   अधिकार को पुष्ट और स्थापित कर सके. लेकिन एक तो ये ध्यान रकहना चाहिए कि इसके प्रयोग से कुछ अधिकार पिता को भी मिलेगें. बहुत संभव है कि छोटे कहे जाने वाले बहुत से लोग मशहूर परिवारों के बच्चों का पिता होने का हक़ सिद्ध कर दें . तब उन साहबजादों को हो सकता है कुछ परेशानी का अनुभव हो . दूसरी बात ये है कि नारी  की सुचिता और सम्मान के मापदंड भी  बदल जाएँ .क्यूँकि बच्चे कोई पेड़ पर तो फलते नहीं हैं वो किसी न किसी स्त्री की कोख से ही जन्मते हैं. इसलिए जब एक स्त्री अपने पति पर अधिकार की जंग लड़ेगी या एक पुत्र का    अधिकार स्थापित होगा तो फिर  पिता और पति का नाम भी जुड़ेगा और कितनी  स्त्रियां  हैं जो अपने अलग  अलग  बच्चों के लिए अलग  अलग  पिता का नाम देना  चाहेंगी  ?  बहारहाल  एक मिसाल समाज में बनी  है तो उसके दूरगामी  परिणाम  होंगे .मुझे इससे कोई चिंता  नहीं है .बल्कि  मैं  खुश  हूँ  कि एक दिन  यह लड़ाई उस  मुकाम  तक  पहुंचेगी  जहाँ किसी बच्चे को अपने पिता का नाम बताने  की जरुरत नहीं पड़ेगी  वो अगर चाहेगा  तो सिर्फ  अपनी माँ का नाम बतायेगा  या वो अगर नहीं चाहेगा  तो वो भी नहीं बतायेगा  और समाज का कोई भी व्यक्ति उसे नीची  निगाह  से नहीं देखेगा .    

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