गुरुवार, 6 मार्च 2014

आकर तो देखो कभी गुजरात म..... ऐं... ऐं .कुछ दिन तो गुज़ारो गुजरात में

कोई हाथ भी न मिलायेगा क्यूँ  चले आये गुजरात में
ये नये मिजाज का राज्य है यहाँ फासले से रहा करो.
ये जो नफरतों की किताब है इसे आंसुओं से लिखा गया
ये किताब है हर आँख में,  इसे चुपके चुपके पढ़ा करो .



इस पुकार को सुनकर दिल्ली से एक आम आदमी गुजरात देखने चला गया .साहब को लगा ये कौन बदतहजीब उनके स्वप्न लोक में घुस आया है. सिपाही दौड़े और उस सिरफिरे आदमी को धर दबोचा  .आदमी तो आम आदमी था. वो हक्का बक्का हो गया. आखिर ये क्या बात हुई? उसे समझ नहीं आया कि मुझे बिना बात क्यूँ पकड़ा ? मैं तो घूम घूम कर सिर्फ देखना चाहता था कि गुजरात कैसे वाईब्रेंट है ?ऐसा तो यू पी, बिहार की बदनाम पुलिस भी नहीं करती है कि घूमने फिरने आये आम आदमी को पकड़कर थाने में बैठा ले. क्या इसी को देखने के लिए चिल्ला चिल्ला कर सारी दुनिया को बताया जाता है कि आकर तो देखो कभी गुजरात में ?अगर दिल्ली का आम आदमी गुजरात नहीं देख सकता है तो फिर गुजरात  का कोई ख़ास आदमी भी दिल्ली की तरफ नजर उठा कर देखने की कौशिश न करे चाहे वो कोई साहब ही क्यूँ न हो .




वीर तुम बढे चलो धीर तुम बढे चलो 
सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो 
तुम मगर हटो नहीं,तुम मगर डटो वहीँ 
कागजी है शेर ये,और एक ढेर ये 
धूल का गुबार का, झूठ बेशुमार का .
झाड़ दो, बुहार दो, फूंक एक मार दो,
शक्ल और अक्ल से,गर्द ये उतार दो.
गर्द ये उतार दो और सब संवार दो 

वीर तुम बढे चलो धीर तुम बढे चलो.


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