रविवार, 20 अप्रैल 2014

चिंता में प्रतीक्षा और प्रतीक्षा में चिंतन



                आडवाणी  जी  सोच रहे हैं कि अब  क्या  करें ? सोचा था हिन्दुस्तान जाकर सियासत करेंगे क्यूँकि  पाकिस्तान में तो उनके लिए कोई जगह बची नहीं थी.  ले दे के गांधी और नेहरू पटेल का हिन्दुस्तान था  जहाँ वे  साम्प्रदायिक सोच की सियासत कर  सकते   थे . सो चले आये हिन्दुस्तान और लग गए उस समूह  को मजबूत करने जो साम्प्रदायिक सोच को लेकर खड़ा था.  उसे आगे बढ़ाया और इतना आगे बढ़ाया कि वो दिल्ली में जाकर राज सत्ता पर काबिज हो गया. लेकिन उनकी किस्मत की खराबी कहें या उनकी निष्ठां पर संदेह कि उन्हें सरकार  की उन्हें कमान नहीं सौंपी गई उन्हें प्रधान  नहीं बनाया गया.  उन्होंने ज्यादा अनमनापन दिखाया तो उन्हें उप प्रधान बना दिया गया और भविष्य में प्रधान पद के लिए प्रतीक्षा करने के लिए कहा गया. इधर इंडिया साइनिंग हुआ और उधर उनकी किस्मत का सूर्यास्त हो गया.वे प्रतीक्षा करने लगे. वैसे और वे कर भी क्या सकते थे ? जनता उनके राम नाम के झांसे  में आने को तैयार ही नहीं थी. उन्होंने बड़े धैर्य से दस वर्षों तक प्रतीक्षा की. उन्हें पूरा विश्वाश था कि अँधेरा छंटेगा, नया सूर्य उगेगा, कमल खिलेगा. लेकिन इससे पहले कि अँधेरा छंटता, सूर्योदय होता, कमल खिलता उस अँधेरे से एक ऐसा कथित आदमखोर जिसे  वो नमो कहते थे निकल कर सामने आ गया जो था तो उनका अपना ही चेला लेकिन अब सबको आँखे तरेरकर दूर भगा रहा था. वे बेचारे प्रधान बनने की प्रतीक्षा ही करते रहे और उधर उनका सारा गिरोह नमो नमो करते हुए उस कथित आदमखोर के कदमों में लौटने लगा.
  ये देखकर वे बहुत नाराज हुए और अपने कोप भवन में जा बैठे. भक्तों ने समझाया,शिष्यों ने धमकाया ज्यादा नौटंकी करने की जरुरत नहीं है. जैसा कहते हैं चुपचाप वैसा करते रहो .आपको कह तो दिया आप पी एम इन वेटिंग हो सो रहो .आप को कौन मना कर रहा है? लेकिन पी एम वी एम बनाने के लिए न हमने कभी कहा है और न बनाएंगे.
आडवाणी जी मन ही मन कसमसाये  और धीरे से बड़बडाये ठीक है मैं भी देख लूंगा कैसे कोई दूसरा पी एम बनता है ?


बात निकली तो फिर दूर तलक  गयी. दूर बिहार का  एक फेकुलर चिल्लाया जो भी नमो को  पी एम बनाने का विरोध कर रहा है  वो पाकिस्तान परस्त है .उसकी जगह हिन्दुस्तान में नहीं पाकिस्तान में है उसे हम चुनाव के बाद पाकिस्तान भेज देंगे.
आडवाणी जी ने सुना तो उनका दिल बैठ गया. पाकिस्तान से जान बचाकर तो यहां आये अब यहां से फिर पाकिस्तान जाना पड़ेगा? ये तो बहुत नाइंसाफी है .पाकिस्तान कैसे जा सकते हैं ? इस उम्र में ज्यादा भाग दौड़ भी तो नहीं सकते हैं. भाग दौड़  कर सकते तो अभी रथ लेकर निकल पड़ते लेकिन उस नामुराद नमो ने पैदल कर दिया.रथ के न पहियों का पता है न घोड़ों का ? अब इस उम्र  में पैदल तो पाकिस्तान जाया नहीं जा सकता है. वो एक समझौैता एक्सप्रेस पाकिस्तान के लिए चलवाई थी उसमें जाना  खतरे से खाली नहीं है. उसमें अपने चेले चपाटे  धमाके करते रहते हैं .पता नहीं कौन स्वयंसेवा करने चला आये. धमाके अपना पराया थोड़ा ही देखते हैं.जब धमाका होता है तो अक्सर अपने ही मारे जाते हैं और अपना इरादा अभी बलिदान  देने का है नहीं, क्यूँकि अभी तो अपने को तो पी एम बनना है. लेकिन इन नमो भक्तों का क्या करें? ये तो बनने देंगे नहीं .ये तो नमो नमो करके बावले हो रहे हैं .अब अगर सारी जनता भी इनकी  तरह  बावली  होकर  मतदान  के लिए चल पड़े तो कुछ रास्ता निकल सकता है .इसलिए सारे मतदाताओं को मतदान करना चाहिए और चुनाव आयोग को चाहिए कि जो मतदाता मतदान न करे उसका मताधिकार जब्त कर ले. बहुसंख्यक  मतदाता तो नमो भक्त है नहीं ,इसलिए ये तो तय है कि मतदाताओं का बहुमत नमो को पी एम नहीं चाहता है. अब देखना ये है कि ये अल्पसंखयक फेकुलर कैसे बहुसंख्यकों को पाकिस्तान भेज देंगे? भारत मेरा चाहे कुछ न हो लेकिन इनके  भी बाप  की जागीर  नहीं है .मैं हिन्दुस्तान में आ गया हूँ तो अब यहीं  रहूँगा. हाँ ये तय कर लें कि ये कहाँ जाकर रह सकते हैं? जब मेरे लिए दुनिया में कहीं और जगह नहीं है तो इनके लिए तो बिल्कुल नहीं है. इन्हें तो बीजा लेने में ही पसीने आ जाएंगे .            

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