गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

जय जनतंत्र


                                   
                                                   
          ऐसा  कभी  नहीं हुआ जब  मंहगाई, बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी, भ्रष्टाचार  चुनाव  के मुद्दे  न रहें  हों लेकिन हर चुनाव के बाद इन समस्याओं  में कुछ कमी नहीं हुई वरन इजाफा ही हुआ है .ऐसा नहीं है कि सरकारों ने कुछ काम नहीं किया. गरीबी और बेरोजगारी हटाने के लिए सरकारों ने  बहुत काम किया है .कई कल्याणकारी योजानाएं चलायी गयी, सस्ती दरों पर कर्ज बांटे, अनुदान दिया लेकिन परिणाम आशा के अनुरूप नहीं आये बल्कि स्थिति और  भयावह होती चली गयी .यानि कि मर्ज  बढता गया ज्यों ज्यों दवा की.जितनी  योजनाएं गरीबी हटाने के लिए चलायी गयी उतना ही भ्रष्टाचार बढ़ता गया. गरीब के हालात न सुधरे उसे सुधारने में लगे नेताओं और अफसरों के पेट फूल गए. फिर उन्हें समस्या के मूल में गरीबी नहीं गरीब नजर आने लगे और उन्होंने देश के विकास के लिए गरीबी को नहीं गरीब को हटाना जरुरी समझा.
                               

  अमेरिका की हावर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़े लिखे  अर्थशास्त्री देश के नीति निर्माता बने. देश के  गरीबों  उनकी घर जमीन से  उजाड़कर कारखाने खड़े किये जाने लगे. हाईवे और ओवरब्रिज बनने लगे. देश में फर्राटे से बड़ी बड़ी गाड़ियां दौड़ने लगीं. देश के विकास को पंख लग गए. और गरीब ? वो विकास की आंधी में उड़ गया. उसने बहुत हाथ पांव मारे कि कहीं अपने पांव जमीन पर टिका ले लेकिन वो बहुत कोशिशों के बाद भी कहीं टिक नहीं सका. वो अगर किसी तरह कहीं टिक भी जाता तो वो उस जगह कुछ दिन चैन से रह भी नहीं पाता था कि विकास उसके पीछे आ धमकता. विकास का और उसका तो जैसे जन्म जन्म  का बैर हो गया था. उसे विकास के लिए जगह खाली करनी पड़ती. उजड़ना ही पड़ता इसके अलावा कोई चारा नहीं था. नेता अब उसे सिर्फ चुनाव के वक्त नजर आता था तब भी वह ठेकेदारों, बिल्डरों से घिरा होता था.वह अगर हाथ जोड़कर अपने उजड़ने का दर्द बयान भी करता तो नेताजी कहते 'ऐसा है भाई जब विकास होगा तभी तो तुम खुशहाल  होगे ? क्या तुम विकास नहीं चाहते या खुश नहीं रहना चाहते हो ?'

          ये कहकर नेताजी अपने साथ खड़े चमचों बिल्डरों, ठेकदारों की तरफ मुस्कराकर देखते .उन सभी के चेहरों पर हंसी खिलखिला उठती. उनके खिलखिलाते  चेहरे और हिलती हुई तोंद देखकर ही गरीब समझ जाता कि विकास कहाँ हो रहा  है. उसकी खैरियत  इसी में थी कि वो इस विकास को ही देश का विकास समझे और उसमें बाधा न बने .ये बात उसे नेताजी भी मुस्कराकर समझा चुके थे और उनके  गुर्गे भी आँखों ही आँखों में समझा रहे थे .          
 लेकिन उसकी समस्या ये थी कि अगर वो ये मान भी ले कि यही देश का विकास है तो इसमें उसकी जगह कहाँ है ? ये  उसे किसी भी तरह समझ में नहीं आता था और न ही कोई मुकम्मल तरीके से उसे बताने के लिए तैयार था .सब उसे आगे, आगे और आगे कहते रहते और वह मुजाहिरों की तरह अपने देश में इधर से उधर डोलता रहता.

 दिमाग पर बहुत जोर डालने पर उसे ये सीधी  सी बात समझ में आयी कि ये विकास अमीरों के द्वारा अमीरों के लिए है और सरकार उनकी विकास कि रप्तार को तेज करने वाले इंजन का नाम है जिसे गरीबों के लहू पसीने  से चलाया जाता है . इसका मतलब है कि विकास में गरीबों की भागेदारी तो होगी लेकिन हिस्सेदारी नहीं हो सकती है वरन ऐसे कैसे हो सकता था कि विकास भी होता रहे और गरीबों का नाश भी होता रहे? जितनी तेजी से विकास होता गया है उतनी ही तेजी से गांव गरीबों का विस्थापन और शहरों में मलिन बस्तियों का विस्तार होता गया है. अस्पतालों  में मरीजों और जिस्म के बाजार में गर्म गोश्त का कारोबार भी बढता गया है. नौजवानों का नक्सली और आतंकवादी बनने का चलन भी बढता गया है. किसानों,मजदूरों और बेरोजगारों की आत्महत्याओं की तो जैसे बाढ़ आ गयी है. बूढ़ों के बेसहारा होने की तादाद बढ़ी है. जेलों में कथित अपराधियों और मानसिक रुग्णालयों में विक्षिप्तों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है . समझ नहीं आता कि क्या विकास के ये भी जरुरी सह उत्पाद हैं ? किसी भी तरह से मन ये मानने को तैयार नहीं है कि हर हाथ काम और हर पेट रोटी के लिए विकास की ये कीमत देनी जरुरी है .हाँ अगर जरुरी भी हो तो फिर भी सबको जीवन की बुनियादी सुविधाएं क्यूँ नहीं मिलती हैं ? या ये शाश्वत समस्याएं हैं और इनका कोई हल नहीं है? नहीं ये शाश्वत समस्याएं नहीं हैं . अगर कुछ लोगों के पेट फूल सकते हैं तो उनका फुलाव कम करके पिचके पेटों के गड्ढे जरूर भरे जा सकते हैं लेकिन अगर नहीं भरे जा रहें हैं तो  इसका मतलब है कि विकास की इस अवधारणा में कहीं न कहीं कुछ न कुछ खोट  जरूर है .पहली ही नजर में सबसे बड़ी गड़बड़ यही नजर आती है कि विकास बाहर से थोपा गया है और उसके सारे लाभ भी बाहर वाले हड़प रहे हैं .इसलिए सबसे पहले विकास में हर स्तर पर स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी होनी चाहिए तथा बाहर के  लोगों की  पैसे  वाली आवारागर्दी  बंद होनी चाहिए .लेकिन जब तक सत्ता ऐसे आवारागर्दों की ताबेदार है  ये बंद कैसे हो सकती है ? इसका मतलब है कि सत्ता पर गरीबों का दखल जरुरी है ताकि वो गरीब के हक़ में फैसला कर सके और उन्हें लागू कर सके .इसके बिना गरीबों का भला होने वाला नहीं है .सत्ता पर गरीबों का दखल कैसे हो सकता है ? सत्ता पर गरीबों का दखल होने के कई रास्ते हैं जिनमें से चुनाव भी एक रास्ता  है .अब चुनाव का वक्त आ गया है .गरीबों को चाहिए कि वो यथासंभव उन उम्मीदवारों को अपना समर्थन दे जो उसकी दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए कुछ करने का हौसला रखते हों .ये जरुरी नहीं है कि वो देवताओं को चुनें धरती पर देवता हैं भी नहीं ,धरती इंसानों के रहने के लिए बनी है इसलिए उसे उन्हीं में से चुनाव करना होगा .बस उसे इतना करना होगा कि वो अच्छे से अच्छे प्रत्याशी  को अपना मत दे किसी तरह कि चम् दमक में चौंधियाए नहीं .ये नहीं सोचना चाहिए कि वह तो बहुत साधनहीन है, बहुत सीधा साधा है .देश में ज्यादा तादाद साधनहीन और सीधे सादे गरीब लोगों की ही है इसलिए उनके प्रतिनिधि का वैसा होना स्वाभाविक है. लेकिन आपका समर्थन मिलेगा तो वह अवश्य ही जीतेगा. इसलिए उठो, आगे बढ़ो  नए भारत के निर्माण  के लिए मतदान  करो. जय जनतंत्र .



               

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