सोमवार, 14 अप्रैल 2014

नक्कार खाने में तूती की आवाज-आम आदमी पार्टी

 

   जब भाजपा  जीतती है तो सोचती है कि उसकी नीतियों की जीत हुई है और जब कांग्रेस जीतती है तो कांग्रेस सोचती है कि उसकी नीतियों की जीत हुई है .इसी  प्रकार यू पी में जब सपा  जीतती है तो वो सोचती है कि जनता ने उसकी नीतियों  को,उसके लोहियावादी समाजवाद को  पसंद किया है लेकिन जब बसपा जीतती है तो वह सोचती है कि जनता ने उसके मायावी अम्बेडकरवाद को समर्थन दिया है .लेकिन ये समझ में नहीं आता है कि इनके सत्ता में रहने के बाद ऐसा क्या हो जाता है जो जनता इन्हें नापसंद करने लगती है और इनकी वही पुरानी नीति रीति के रहते हुए भी इन्हें सत्ता से उखाड़ फेंकती है ?
 असल में जनता इनकी नीतियों से प्रभावित होकर इन्हें न वोट देती है और न इन्हें सत्ता से बेदखल करती है. सच बात ये है कि वो इनकी लूट खसौट से तंग आकर इन्हें सत्ता से पैदल करती है लेकिन कोई बेहतर विकल्प सामने न होने के कारण  इन्हीं को गद्दी सौंपने के लिए मजबूर भी होती है. यह आम जनता की मानसिकता है जो बदलाव तो चाहती है लेकिन कोई विकल्प न होने के कारण हर चुनाव में इधर से उधर डोलती रहती है .ये जनता चाहे शिक्षित न हो लेकिन वह जाति और धर्म से ऊपर उठकर सोचती है .या ऐसा भी हो सकता है कि ये वो आम जान हों जिनका धर्म या जाति के रूप में राजनीति में  कोई प्रभावी हस्तक्षेप नहीं है. लेकिन यकीन मानिए लोकतंत्र को मजबूत करने में इन्हीं का योगदान सबसे ज्यादा है .वरना भारत में जाति और धर्म की जकड़बंदी इतनी मजबूत है कि लोग अपनी जाति और धर्म के व्यक्ति का  कोई गुण दोष नहीं देखते हैं बस यह देखते हैं कि  वह उनकी जाति का होना चाहिए या उनके धर्म का. फिर चाहे वो खूनी हो, डाकू हो, तस्कर हो, धनपशु हो,व्यभिचारी हो भ्रष्टाचारी हो कुछ भी क्यों न हो बस उनकी जाति का हो .बल्कि वह जितना बड़ा बाहुबली होगा, बदनाम होगा वो उतना ही उनका सिरमौर होगा .कोई सवाल करेगा तो वो तुरंत विपक्ष  का उदाहरण देकर कह देंगे उधर भी तो वह है,हमारा नेता ऐसा है तो क्या हुआ?  लेकिन इससे किसी के गलत होने को वैधता तो हासिल नहीं हो जाती है.
 पहली बार आम आदमी पार्टी के रूप में जनता को एक ऐसा विकल्प मिला है जो पारम्परिक राजनीतिक दलबन्दी की दलदल  से सर्वथा अछूता है .जनता एक बार उसे आजमा सकती है. लेकिन इस बार झूठों का इतना शोरगुल है कि उसकी शुचिता की पुकार नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर  रह गयी है . जब यह शौर शराबा थम  जाएगा तब यह आवाज जरूर सुनी जायेगी लेकिन तब तक जो नुकसान हो चुका होगा उसकी भरपायी शायद ही हो पाये. इसलिए अच्छा हो अगर हम इस आवाज पे गौर करें और एक बार इस विकल्प को भी  आजमाएं .            

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें