शुक्रवार, 30 मई 2014

कवियों के मुखौटे

 
 
  पता नहीं समझदारी की क्या उम्र होती है लेकिन कुछ मामूली बातें भी इतनी देर से समझ में आती हैं कि अपनी समझदारी पर शक होने लगता है .जैसे  कि मुझे ये समझने में बहुत वक्त लगा कि समाजवाद, जनवाद, राष्ट्रवाद,सम्प्रदायवाद सब दिखावे के मुखौटे हैं या बाजार का बिकाऊ माल है. कवि भी अब ऐसे सौदागर हैं जो जैसा मौका हो वैसा माल बेचते हैं .इसका अनुभव तो काफी था लेकिन कुछ ख़ास कवि मित्रों को अभी दो दिन पहले एक कवि सम्मेलन  में नजदीक से देखने परखने का अवसर मिला. कवि नामचीन थे, जनवाद में उनकी आस्था अडिग थी. कैसा भी विपरीत माहौल रहा वो वो अपनी बुलंद आवाज में जनता की पीड़ा को  स्वर देने के लिए ख्यात थे .लेकिन उस दिन जो कुछ देखा वो कुछ बहुत अच्छा नहीं था.वो कवि जो किसानों मजदूरों की बात कहते नहीं थकता था कवि सम्मेलन की समाप्ति के बाद  उन्हीं कवियों की सोहबत में शराब के पैग पर पैग पिए जा रहा था जो विशुद्ध कारोबारी कवि थे. यही नहीं उसके अंदर काव्य पाठ के मानदेय को लेकर वैसी ही बेईमानी भरी थी जैसी ज्यादातर धन्धेंबाज कवियों में होती है. रुपये पैसे को लेकर जितनी गिरावट मैंने इन जनवादी कवियों में देखी है उतनी तो गैर प्रतिबद्ध धंधेंबाज कवियों में भी देखने को नहीं मिलती है. ये ऐसे लोग हैं जिनसे प्रेरित  होकर  मेरे जैसे लोगों ने जनवाद की राह पर कदम बढ़ाया था .लेकिन अब तो ये बात समझ में आ रही है कि जैसे कुछ लोग राष्ट्रवाद के नाम पर पाकिस्तान को गाली. कश्मीर को लेकर जनून, गाहे बगाहे शिवाजी,प्रताप, दुर्गाबाई ,लक्ष्मीबाई की स्तुति,ओरंगजेब,गौरी,गजनवी की भर्सना जैसे भावों को तड़क भड़क वाली शब्दावली में तुकबंदी कर लेना ही कविता मानते  है उसी तरह जनवादी किसानों,मजदूरों,शोषण, इंकलाब,साम्प्रदायिकता का विरोध  ,धर्मनिरपेक्षता, रोटी, भूख,बेकारी,दमन और अत्याचार जैसे भावों को खुरदरी लेकिन मंजी हुई शब्दावली में रच लेना ही कविता मानते है. कुछ लोग पहले तरह की कविता बेच रहें हैं कुछ दूसरे तरह की. सब जन भावनाओं का दोहन करके अपना कारोबार फैलाने में लगे हैं . कथित राष्ट्रवादी कवि को जहाँ धन कुबेर पालते पोसते हैं वहीँ जनवादी कवि खुद पालतू बनने को लपकते रहते हैं. दोनों तरह के कवि  एक जगह बैठकर दारू गटकते हैं ,गदें चुटकले गढ़ते हैं ,और कविता को सच  मानने वालों पर हँसते हैं.

    जो लोग हजार हजार रुपये की दारु पी जाते हैं वो किस तरह मंच पर भूख और रोटी पर कविता पढ़ते हैं? वो किस तरह शोषण के विरुद्ध लड़ाई की बात करते हैं ? क्या वो समझते हैं कि जनता इतनी मूर्ख है कि वो उनके आव्हान  पर कभी शोषण के विरुद्ध और कभी किसी देश के विरुद्ध लड़ने के लिए खड़ी हो जायेगी?  ऐसे कवियों की तरह बहुत से बुद्धिजीवी मुझे मूर्ख कहेगें .वो कहेंगे तुम हर बात को दिल पर क्यों लेते हो ? शराब पीना बुरा कब है ?
        उन सबसे मेरा इतना ही कहना है कि मैंने अपनी जिंदगी में कभी शराब नहीं पी है लेकिन मैंने ये भी कब कहा है कि शराब पीना बुरा है ? शराब तो क्या मैं तो ऐसे बहुत से कामों को भी बुरा नहीं कहता हूँ जिन्हें करने  वाले भी सार्वजनिक रूप से बुरा कहते  नहीं थकते हैं.मेरा तो सिर्फ इतना कहना है कि आप जो करना सही समझते हो उसे सही कहने की हिम्मत भी होनी चाहिए .सवाल ये नहीं है कि आप उसे करते हो या नहीं करते हो या आप वैसे हो या नहीं हो लेकिन आप उसे सही मानते हो या गलत मानते हो ये बिलकुल स्पष्ट होना चाहिए .आप जब स्त्रियों,नाबालिगों या विकलांगों के हक़ में आवाज उठाते हो तो आप का स्त्री ,नाबालिग या विकलांग  होना जरुरी नहीं होता है लेकिन अगर आप स्त्री, नाबालिग या विकलांग के उत्पीड़क हैं और मंच पर उनके हक़ में मुट्ठियाँ बांधकर उत्पीड़कों को ललकारते हैं तो आप एक बड़े बहुरूपियां और धोखेबाज के सिवा कुछ नहीं हैं . मेरा मानना है कि सामाजिक जनवादी शक्तियों के बेअसर होने में ऐसे रगें सियार ही जिम्मेदार हैं .जनता इन्हें माफ़ नहीं कर सकती है .

फेस बुक पर चर्चा


  • Kuldip Kumar Kamboj--- कविवर, क्यों कवियों को बेपर्दा कर रहे हैं ?
    19 hours ago · Unlike · 1
  • Malhotra Sanjeev amer nath ji Bura na manna main apki bhut si sochon ko galt kehta aaya hun aajtak. mager aaj khusi is baat ki hui ki apne sachai ko sayed apne apni nangi aankho se dekha or mehsus bhi kiya. der se hi sahi mager ab aapki aatma aage se galt or ache ka bheed krna suru kar diya haii
    18 hours ago · Unlike · 1
  • Amit Bhartiya Bobby Bahut badhia sir ji Dil kholke rakh diya ji.
    18 hours ago · Unlike · 1
  • Roshan Kumar नारी उत्थान के प्रबल पक्षधर,, उस रचनाकार की कलम में,, काफी धार है,,, पर पत्नी के सिर का पल्लू सरकना भी अस्वीकार है...............यह होता है सर जी ,, कई बड़े रचनाकारों के निजी और सामाजिक जीवन में काफी अंतर देखने को मिलता है ........
    18 hours ago · Unlike · 2
  • Ashok Verma भयकंर बाजारवाद है मित्र , रचनाएँ बाजार की मागँ को देखकर लिखी जाती है। सब मुखोटे लगाकर बाजार मेँ जाते हैँ।
    9 hours ago · Unlike · 1
  • Sitwat Ahmed Maine yahi sab shiksha aur patrkarita ke kshetra me bhi dekha hai.
    5 hours ago · Unlike · 1
  • Pradeep Kumar Tyagi Sarawa आप सही कह रहे हैं मधुर जी और आपकी पीडा भी जायज़ है लेकिन आज का सत्य यही है।
    4 hours ago · Unlike · 1
  • Amarnath Madhur आदरणीय प्रदीप जी आप ताजा वाकये से वाकिफ हैं .कभी किसी गैर के चोट करने पर दिल नहीं टूटता है दिल जब भी टूटता है आपके अपने आदर्शों के टूटने पर टूटता है .हम लोग पैसे वालों को धन पशु कहकर गरियाये नहीं थकते हैं लेकिन आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति में होते हुए भी हम पैसे के लिए वो भी काव्य पाठ के मानदेय के लिए किसी भी स्तर तक गिर जाते हैं . यहाँ तक की आपस में बेईमानी करने,धोखा देने से भी नहीं हिचकते हैं .हमने बड़े कवि होने का पैमाना उन कथित मंचीय कवियों को मान लिया है जो कविता नहीं मंच पर भांड गिरी करते हैं .भांड होना कोई आसान काम नहीं है न ही बुरा काम है लेकिन आप कहें तो कि मैं कवि नहीं भांड हूँ .आपको वही इज्जत दी जायेगी जो एक अच्छे कलाकार को दी जाती है .
    खैर मुझे यह संतोष है की मैं अभी समझदार नहीं हुआ हूँ. मैं अभी अपरिपक्व बुद्धि वाला हूँ .बौद्धिक रूप से अगर मैं परिपक्व होता तो अब तक किसी न किसी कारोबारी लेखक के साथ चिपक लेता.कार्यक्रम के संयोजकों और अखबार के संवाददाताओं के सामने घोड़े की तरह हैं हिनहिनाता . मैं अपरिपक्व बुद्धिवाला हूँ इसलिए अभी भी नया सीखने, जानने, समझने की ललक मेरे अंदर है .मैं अपरिपक्व बुद्धि वाला हूँ इसलिए सामने वाले की हैसियत का ख्याल किये बगैर अपनी समझ के अनुसार अच्छे बुरे की प्रतिक्रिया देने का माद्दा वैसे ही है जैसे एक किशोर वय के बच्चे में होता है. इसलिए मैंने शुरू में ही समझदारी की उम्र को लेकर सवाल उठाया था. 
    अब संजीव जी की टिप्पणी पर भी अपनी बात रखना चाहूंगा. संजीव आप ये जान लीजिये कि इन कथित जनवादियों से रुष्ट होने का मतलब ये नहीं है कि कथित राष्ट्रवादी शुद्ध पवित्र हो गए हैं और अब मैं उन्हें पूजना शुरू कर दूँगा. मैं जहाँ से चलकर आगे बढ़ आया हूँ वहाँ लौटकर वापिस नहीं जाऊँगा. कथित जनवादी पतित हो सकते हैं लेकिन जनवाद मार्क्सवाद में ऐसी कोई कमी नहीं है जिसके लिए उसे नकारा जाए. लेकिन जहाँ तक आपकी विचारधारा की बात है वो भविष्य की नहीं,वर्तमान की नहीं अतीत की पोषक है उससे मानवता का कोई भला नहीं होने वाला है .आप में बहुत भले और परोपकारी लोग हो सकते हैं लेकिन वो समाज को बदलने में नहीं समाज को सुधारने भर में यकीन करते हैं. जो विचारधारा शोषण पर आधारित व्यवस्था को कायम रखने में यकीन करती हो वो हमें स्वीकार नहीं है.

    • Prathak Batohi खाते सभी वाद के लोग खाना ही है पर एक मोटिवेशन होता है जो वाद के पीछे लोग खड़े कर देता है
      18 hours ago · Unlike · 2
    • Tukaram Verma मधुर जी किस भ्रम में पड़े हुए हो, इस देश को वर्तमान में ही नहीं, सहस्रों वर्षों से, कवियों. अध्यापको, और भाड़ों ने जितना गर्त में फेका है उतना उन शासकों ने नहीं जिन्हें इतिहास दोषी सिद्ध करता है| आज़ादी के बाद तो अध्यापकों, साहित्यकारों और पत्रकारों की रा...See More
      10 hrs · Unlike · 1
    • Girijesh Tiwari मुखौटे - तरह-तरह के !
      फिर भी सच आता ही है सामने !
      झूठ का परदा तार-तार हो ही जाता है !

      कुछ भी छिपा नहीं पाते मक्कारों के बेचारे मुखौटे !



    साहित्यकार किसी आम के पेड़ पे रस्सी से लटका हुआ है, बिलकुल निष्क्रिय. रात भर की नोच खसोट की थकन मिटाता हुआ, बिलकुल शांत. सीमाएं खोली जा चुकी हैं, गर्म हवा के आने पर से सारी पाबंदियां हटाई जा चुकी हैं, गिद्ध अपने अपने हिस्सों को नोचने में लगे हुए हैं, कव्वे हाथ में लाल झंडा लिए अपनी बारी का इंतज़ार कररहे हैं, कीड़े मकौडों की न ही गिनती होती है, न ही उनके हिस्से में मांस आता है, उन्हें मिलेगी हड्डियाँ, अपनी अपनी जातियों के हिसाब से, भूखा पेट कव्वा मारेगा टोंट उनमे से ही कुछ कीड़ों पर, कीड़े न भागेंगे, न ही विरोध करेंगे, अपनी अपनी हड्डियों में पीले पड़े रहेंगे बस. इस जंगल में सब कुछ ठीक ठाक है, सभी मिल बाँट कर खाते हैं. सारे शहर में है लोकतंत्र. बस यह एक साहित्यकार...... यह साहित्यकार की लटक रहा है आपम के पेड़ से , बिलकुल निष्क्रिय.
    इस ज़मीन में विरोध तो उपज सकता है, शुद्ध साहित्य नहीं....
    Unlike ·  · .
    • Anil Sakargaye शुद्ध साहित्य की जमीन को तो वर्षो पहले ..........ज्ञानपीठो की जे . सी . बी ...मशीनों ले उलट पलट कर दिया प्रभु
      3 hrs · Unlike · 4
    • Harsh Pandey मुझे लगता है कमी है शुद्ध साहित्यिक प्रसार की . .हो सकता है कि एक अच्छी संख्या में शुद्ध साहित्य लिखा जा रहा हो .... साहित्यिक पत्रिकाओं कि भरमार है , ,जिसमे आज भी कहानी कविताएँ अपनी अपनी शुद्ध खुशबू लेकर नए नए रूपों में छपती हैं ...मगर हमें नहीं मालूम कि वो कौनसी पत्रिकाएँ हैं ... शुद्ध साहित्य मौजूद है! मगर अकेला है
      1 hr · Unlike · 2
    • Monalisa Saini साहित्य और साहित्यकार के हालात को समझने के लिए ये एक पोस्ट ही काफी है..गागर में सागर,,,
      1 hr · Unlike · 2
    • Prasanna Prabhakar साहित्य समाज का दर्पण ही तो है। जिस ढंग से समाज बदला है , एक बड़े बज़ारोंमुख मध्यम वर्ग का फैलाव हुआ है , साहित्य के मायने बदल से गए हैं कईयों के लिए चेतन भगत सरीखों के सामने आज प्रेमचंद भी झखने लगें 

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें