शुक्रवार, 9 मई 2014

जाति का घमासान

                                               
भाजपा ने राम जन्म भूमि मंदिर का शिलान्यास ९ नवम्बर, १९८९ को बिहार के श्री कामेश्वर चौपाल से कराया था। प्रचारित किया गया कि भाजपा ने सामाजिक समरसता के प्रति अपने लगाव और दलितों को समुचित सम्मान देने की अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करने के लिए अनुसूचित जाति के व्यक्ति से यह पुण्य कार्य कराया है . बाद में पता लगा कि कामेश्वर चौपाल अनुसूचित जाति के नहीं हैं उनका जाति प्रमाण पत्र फर्जी है .
 आज नरेंद्र मोदी के पिछड़ी जाति के होने को लेकर विवाद हो रहा है.राम जाने सच क्या है? लेकिन एक बात स्पष्ट है कि ये पूरी बहस ही फिजूल की बकवास  है.अगर कोई व्यक्ति पिछड़ी या अनुसूचित जाति से है तो सिर्फ इतने भर से ही वह किसी पद का सुपात्र नहीं हो जाता है .उसके लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी जाति से भले ही पिछड़ा हो लेकिन उसकी सोच पिछड़ी हुई न हो .अधिकांशत: यह देखा जाता है कि अगड़ी कही जाने वाली  जातियों के चौधरी  बहुत ही दकियानूसी सोच रखते हैं जबकि पिछड़ी और दलित कही जाने वाली मेहनतकश जातियाँ अपने खुले सामाजिक माहौल के कारण आधुनिक सोच के ज्यादा  नजदीक होती हैं और  वक्त के हिसाब से स्वयं को परिवर्तित करने में उन्हें ज्यादा मशक्क़त नहीं करनी पड़ती है .यह बात ऐतिहासिक तथ्यों से भी पुष्ट होती है .विधवा पुनर्विवाह,कन्या वध, दहेज़ उत्पीड़न से लेकर ऑनर किलिंग तक जितनी पिछड़ी मानसिकता अगड़ी और सबल जातियों की है उतनी  कमजोर जाति वर्गों की नहीं है .इसलिए जाति के आधार पर किसी का सहानुभूति लेना या उसकी उपेक्षा करना बिलकुल ही गलत है .
 यूँ अब ऐसी जातियाँ भी पिछड़े  वर्ग में शामिल हों गयीं हैं जिन्हें देखकर लगता है कि अगर ये पिछड़ी  हैं तो भारत में कोई अगड़ी जाति वर्ग नहीं है . लेकिन ये तो वोट बैंक की राजनीति है जिसके बारे में ज्यादा चर्चा नहीं होती है .वोट बैंक का शौर अलपसंखयकों के सन्दर्भ में तो खूब उठाया जाता है लेकिन इन सबल जातियों के सन्दर्भ में चर्चा नहीं होती है . किन्तु फिर भी एक बड़ी जनसंख्या  भारत में उन जातियों की है जो अनुसूचित जाति से बाहर हैं लेकिन कमोबेश उन्हीं के जैसी स्तिथि में हैं बस उनके साथ सामाजिक भेदभाव वैसा नहीं होता था जैसा अनुसूचित जातियों के साथ होता था .लेकिन कोई ये न समझें कि उनके साथ कोई सामाजिक भेदभाव नहीं था. भेदभाव तो भारतीय सामाजिक  व्यवस्था की बुनियाद है और यह एक जाति का दूसरी जाति के साथ संबंधों में ही नहीं पाया जाता है स्वयं एक ही जाति के अंदर भी होता रहा है .अगर ऐसा नहीं होता तो नौ कन्नौजिया  तेरह चूल्हे वाली कहावत न होती .एक ही जाति में बीसे और दस्से का भी भेदभाव है .अनुसूचित जाति में चमार और जाटव के बीच ही बराबरी का रिश्ता नाता नहीं है .लेकिन भेदभाव के ये सारे बंधन  आधुनिकीकरण  के दौर में शिथिल हो रहें हैं अब केवल निहित स्वार्थी तत्वों  द्वारा अपना प्रभुत्व बनाये रखने के लिए इनका राजनीतिक  इस्तेमाल होता है वरना  ये भेद भाव कभी का  ख़त्म हो गया  होता  .इसीलिये ये बात समझ से बाहर है कि नरेंद्र मोदी की जाति को लेकर बहस करने में कौन सी अक्लमंदी दिखाई जा रही है ? क्या इक्कीसवीं सदी के वैश्विक परिदृश्य में भारत धर्म और जाति के रंगबिरँगें चीथड़े पहनकर खड़ा होगा ? क्या इसे भी हम अनेकता में एकता की भारतीय मिसाल कहेंगें ? सामाजिक एकता के लिए  सबसे अच्छा ये है कि इस दकियानूसी सोच को बुलडोजर चलाकर बिसमार  कर दिया जाए तथा प्रत्येक व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी सोच और कर्म के आधार पर किया जाए, उसके गुण और दोष के आधार पर किया जाए उसकी जाति ,धर्म या लिंग के आधार पर न किया जाए. एक और हमारा न्यायालय किन्नर को तीसरे लिंग के रूप में मान्य कर अन्य नागरिकों के भाँति उन्हें   समस्त संवैधानिक अधिकारों के इस्तेमाल की इजाजत दे रहा है वहीँ दूसरी और हम जाति के आधार पर किसी को सवालों से घेर रहें हैं. मैं कहता हूँ कि पिछड़ी और अनुसूचित का ही नहीं वरन एक योग्य किन्नर भी अगर इस देश का प्रधानमंत्री बन जाए तो इसमें हर्ज क्या है ?    

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