बुधवार, 11 जून 2014

कुछ अशआर

कुछ दिन तो वफ़ा हमसे तुम ओर किये होते    
यूँ रूठ के जाने की ऐसी भी क्या जल्दी थी ? 

जो लोग हैं गुस्से में सच्चे भी हैं अच्छे भी  
झूठों के ही चेहरे से मुस्कान नहीं जाती .

बालों की सफेदी ने एहसास ये दिया है 
जज्बात नहीं जाते, हाँ उम्र चली जाती .

जब उम्र थी हमारी चाहा नहीं किसी को 
चाहत जगी है अब जब वो उम्र नहीं आती .

जब जलेबी की तरह चकराये ज़िन्दगी
कुछ देर तसल्ली से बैठ क्यों न रस पियें .


मेरा चाहने वाला भी है कोई  
किसी ने अभी मुझको आवाज दी .



हाकिम की ये मर्जी  है देखें हंसी नज़ारे 
फुटपाथ पे बिस्तर है और सर पे आसमान .  


सामने मौत भी हो मौत नहीं लगती है  
उठती गिरती तेरी पलकों को अजल कहते  हैं  .

मिलने को जिस जगह कहो हम उस जगह मिलें  
लेकिन बताओ क्यों भला हम बेवजह मिलें  ?
कुछ दिल मिलें तो मिलने की कोई वजह बनें 
यूँ रस्मतम गैरों की तरह किस तरह मिलें ? 




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