शनिवार, 21 जून 2014

ओ मीत कबीरे



"ओ मीत कबीरे ....
तुम्हारी लुकाठी को ही बनाना होगा जलता हुआ लुहाठा
कि बस्ती में घुस आया आदमखोर
हाहाकार से नहीं आग से डरता है |"

ओ मीत कबीरे ....
लुकाठी अपनी ..ज़रा इधर बढ़ाना ,
कि कलम की नोक गुठिया गयी है |
‘क्रान्ति’ लिखता हूँ तो ‘भ्रान्ति’ लिख जाता है |
जब धार और धर्म दोनों से च्युत हो चुके हों शब्द
तब तुम्हारी लुकाठी को ही बनाना होगा जलता हुआ लुहाठा
कि बस्ती में घुस आया आदमखोर
हाहाकार से नहीं आग से डरता है |||
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ओ मीत कबीरे ....
अपने कदमों के पास बैठकर हमें भी
बुनने दो जीवन का ताना बाना ...
कि जहाँ रोटी के लिए गिरा पसीना ही अर्ध्य
और ज़िन्दगी के फर्ज़ अदा करना ही इबादत हो जाये
काशी और मगहर के बीच फर्क मिटे कुछ इस तरह
कि ज़िन्दगी का नरक भी
मौत के स्वर्ग से बढ़कर हो जाये |||
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ओ मीत कबीरे ....
तुम सदा वेगमान प्रगतिशील जीवन धारा हो |
तुम ही अमीर खुसरों के दोआब में हो
और तुम ही ग़ालिब का ख्याल में भी
मुक्तिबोध ने जिस संकल्पधर्मा चेतना के
रक्ताप्लावित स्वर को खोजा
वो तुम ही हो कोई और नहीं |
तुम ही नागार्जुन की वह नज़र हो
जिसने उस ‘मन्त्र’ को पहचाना था
जिसके पेट में सर्वहारा समाया हुआ है |.
केदार का ‘हाथी सा बलवान जहाजी हाथों वाला’
तुम ही हो कोई और नहीं |
कुटिल कृपण धूर्त झूठ को तार तार करते
परसाई के व्यंग्य बाण भी
तुम ही हो कोई और नहीं |
जब तक सच कहने का साहस धरती पर है
जब तक पीड़ित शोषित जनता का स्वर जीवित है
तुम जीवित हो तुम मुखरित हो
ओ मीत कबीरे ....
ओ मीत कबीरे ....||||
(chitr : sant kabir math ...varanasi courtesy google )

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