शुक्रवार, 27 जून 2014

कराग्रे वस्ति लक्ष्मी,कर मध्ये सरस्वती

             कराग्रे  वस्ति  लक्ष्मी,कर मध्ये  सरस्वती,  करमूलेत गोविन्द:  प्रभाते  कर  दर्शनम्
           कहा गया है कि 'उँगलियों  के पौरवों  में समृद्धि, हथेली  के मध्य  में ज्ञान,  हाथ के मूल में भगवान  का वास  है.'
       लेकिन  कहावत  तो  मुट्ठी  में रूपया  भींच  कर  रखने  की है ज्ञान  को हथेली  में दबाकर रखने  की बात  कहीं  भी नहीं सुनी है .
      हाथ के मूल में भगवान होने की बात एक बार को मानी जा सकती है क्यूँकि भुजा शक्ति का प्रतीक है और आस्थावान मनुष्य मानते हैं कि शक्ति का स्रोत ईश्वर है .  लेकिन उँगलियों  के पौरवों  में लक्ष्मी  का वास होने क्या अर्थ है ? अगर ये माना जाए कि जीविका अर्जित करने में उँगलियों की अहम भूमिका है तो यही अहम भूमिका ज्ञान प्राप्त करने में भी तो है .इसलिए क्या यह उचित न होता कि उँगलियों के पोरों पर सरस्वती को बिठाते ताकि ज्ञान प्राप्त करके अर्जित धन को मुट्ठी में किया जा सके .
     सही व्याख्या तो ज्ञानी जन ही कर सकते हैं लेकिन अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करना  भी कोई अपराध तो नहीं है ?इसलिए जैसा समझ में आया वैसा लिख दिया है. कुछ गलत होगा तो कोई न कोई ज्ञानी आकर दुरुस्त कर ही देगा .फेस बुक पर कोई ज्ञानियों की कमी है ? या यहाँ क्या  किसी को ट्यूशन फीस देनी पड़ती है ?किसी को कुछ नहीं देना है मुफ्त का चन्दन घिस मेरे नंदन .सुबह सुबह चन्दन घिसने की बात शुभ है . तुलसीदास चन्दन घिसें तिलक लेव रघुवीर .अब कोई न कोई तो तुलसीदास चन्दन घिसेगा .हम अपना थोबड़ा उठायें ही हैं जैसे ही घिसकर गर्दन उठाएगा हम थोबड़ा  थोड़ा  आगे बढ़ा देंगे. बस तिलक हमारे मस्तक पर लगा और फिर  हम उन हजारों तिलकधारियों में शामिल हुए जो धर्म संस्कृति के अकेले  सूरमा हैं . आई  एस  आई  मार्का  की तरह   तिलक भी सांस्कृतिक सूरमाओं का सरटीफाई मार्का  है . इसे लगाने के विद्वता, सम्मान, अभिमान,ज्ञान के अधिकृत सप्लायर हो जाते हैं . आपका कहा पत्थर की लकीर हो जाता है जिसे लांघने की जुर्रत आम आदमी तो क्या राजनेता और न्यायधीश भी नहीं कर सकते हैं .   

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