शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

'सुपर - 30' वाले आनंद कुमार को सलाम !


आनंद कुमार की पापड़ बेचने से सुपर 30 तैयार करने तक की कहानी -
सुपर 30 के संस्‍थापक आनंद कुमार - "मेरे बच्चो और बच्चियो, मैं आनंद कुमार पटना बिहार से आया हूं। किसी समय इसका इतिहास गौरवशाली था और नालंदा विश्वविद्यालय का नाम पूरी दुनिया के शिक्षा जगत में था। ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज तो बाद में आए। आज बिहार क्राइम की चपेट में है, लेकिन वो अलग बात है। आज मुझे बुलाया गया है आपसे बतियाने के लिए। मैं आपको कुछ छोटी-छोटी कहानियां सुनाऊंगा- ये कहानियां दादा-दादी, नाना-नानी की नहीं बल्कि रियल लाइफ की कहानियां हैं।
मैथ में मेरी जबरदस्‍त रुचि थी
ये सुपर 30 क्या है, इसकी कहानी क्या है मैं बताना चाहता हूं। मैं खुद बचपन में मैथेमेटिक्स पढ़ना चाहता था। मैं इंजीनियर बनना चाहता था, साइंटिस्ट बनना चाहता था और बचपन से रेडियो, ट्रांजिस्टर सुधारा करता था। क्रिकेट या फिल्म देखना मेरा शौक नहीं था। लोगों ने कहा सही में साइंटिस्ट बनना है तो साइंस पढ़ो, मैथेमेटिक्स पढ़ो।
मैंने जब पढ़ना स्टार्ट किया और पढ़-पढ़कर मुझे मजा आने लगा तब पटना यूनिवर्सिटी के साइंस कॉलेज के देवीप्रसाद वर्मा का मुझे सान्निध्य मिला। मैंने दो-तीन फॉर्मूले ईजाद किए तो उन्होंने कहा ये इंग्लैंड भेजो वहां पब्लिश करवाओ। मैंने इंग्लैंड भेजा और पेपर्स वहां पब्लिश हुए। उन्होंने वहां बुलाया। मेरे गुरु ने कहा- बेटा जाओ वहां नाम रोशन करना, लेकिन इंग्लैंड से उन्होंने बताया हम सिर्फ ट्यूशन फीस माफ कर सकते हैं।
हमारे घर का खर्च चलाना भी मुश्किल होता था
मेरे पिता बहुत गरीब थे। वे पोस्टल डिपार्टमेंट में लो पेड क्लर्क थे। हमारे घर का खर्च चलाना भी मुश्किल होता था। प्लेन फेअर 50 हजार का खर्च कैसे पूरा करेंगे? पिता ने कहा कि बेटा तुम जरूर जाओ उन्होंने जर्नल्स की कॉपीज डिपार्टमेंट के लोगों को दिल्ली भेजी तब वहां से बताया गया हम कुछ मदद करेंगे। पिताजी ने खुशी से कहा भी मेरा कोट अलमारी में रखा है, पहनकर जाना और तुम्हारे लिए पैंट सिलवा देंगे। डिपार्टमेंट वाले 50 हजार रुपए देने को तैयार हो गए और 1 अक्टूबर 1994 को मुझे कैम्ब्रिज जाना था।
मेरे पिता की मौत हो गई और मेरा करियर वहीं समाप्‍त हो गया
इसके पहले 23 अगस्त 1994 को रात 10 बजे पिता का निधन हो गया। मेरा कॅरियर वहीं समाप्त हो चुका था। मेरे चाचा अपाहिज हैं, नानी बीमार थी। पूरी जॉइंट फैमिली का बोझ मेरे पर ही आ गया, तब मैंने डिसिजन लिया कि कैम्ब्रिज नहीं जाऊंगा और पटना में रहकर काम करूंगा। यहां तक कि पिताजी की जगह अनुकंपा नियुक्ति पर भी मैं नौकरी नहीं करूंगा। तब तक मैं ग्रेजुएशन कर चुका था और क्लर्क की नौकरी करने पर मैं उसी से बंधकर रह जाता। तब मैंने सोचा कि मैं मैथेमेटिक्स में काम करके ही कमा-खाएंगे।
हमने पापड़ बेचना शुरू किया
भाई भी वॉयलिनिस्ट थे, उन्होंने म्यूजिक से जीवन-यापन की बात कही। तब हमने एक फॉर्मूला ईजाद किया। बहुत कष्ट की स्थिति में माताजी पापड़ बनाकर छत पर सुखाती थीं और उसे बैग में लेकर, झोले में लेकर मैं शाम को 4 से रात 8 बजे तक साइकिल पर घूमकर पापड़ बेचने लगा और पापड़ की कमाई से घर का खर्च चलता था। बाद में साल-दो साल बाद पापड़ बेचने के बाद मुझे लगा कि कुछ करना चाहिए।
मैंने सोचा मैथ ही अब सहारा बनेगा, मेरा भी और दूसरों का भी
मैंने रामानुजम स्कूल ऑफ मैथेमेटिक्स की स्थापना की। इस स्कूल में कुछ गरीब बच्चों को सिलेक्ट किया और उन्हें पढ़ाना शुरू किया। चाहे वह आईआईटी की तैयारी करता हो, इंजीनियर बनना चाहता हो, ओलिंपियाड की तैयारी करता हो, बैंक क्लेरिकल नौकरी की तैयारी करता हो, पीओ की तैयारी करता हो, सबको पढ़ाना शुरू किया और सौ-दो सौ या चार सौ जो भी देता था, हम लोग रख लेते थे। पढ़ाना दो बच्चों से शुरू किया और सौ-दो सौ होते-होते संख्या पांच सौ तक जा पहुंची, तब हमें जगह की कमी होने लगी। तब हमने बड़े हॉल की व्यवस्था की और फीस रख दी पांच सौ रुपए सालाना। उस पांच सौ रुपए सालाना में भी हमारा काम चल जाता था। हमने मकान बनवाया।
खराब लोग भी हैं दुनिया में
दुनिया में अच्छे हैं तो बुरे लोग भी हैं। सुपर 30 की सफलता कोचिंग वाले पचा नहीं पाए। उनका कहना था हम यहां बड़ी-बड़ी कोचिंग चला रहे हैं। सब कोचिंग माफिया ने एक एसोसिएशन बनाकर दबाव डाला और कहा तुम भी पैसा लो। सबसे बड़े क्रिमिनल ने फोन किया और कहा नमस्कार आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। हमको मदद चाहिए।
पैसा जो तीस बच्चों को खिलाते-पिलाते हो वही पैसा दे दो। हमने कहा ये तो नहीं देंगे, चाहे जो कर लो। उन्होंने बम फेंका, गोली चलाई और चाकू मारने भी आए। चाकू तो मेरे एक शिष्य के बीच में आने पर उसी के पेट में घुसा दिया। वह तीन महीने तक अस्पताल में भरती रहा। जब डॉक्टर ने खून मांगा तो 30 बच्चों के साठ हाथ ऊपर उठ गए।
बोरे पर बैठकर भी पढ़ सकता है
एक दिन अभिषेक नाम का बच्चा आया। उसने कहा मैं 500 रुपए नहीं दे पाऊंगा सालभर में किस्तों में दे पाऊंगा। हमारे पिता जब आलू निकालेंगे, तब ही हम पैसा दे पाएंगे। मैंने कहा दे तो दोगे, लेकिन पटना में रहोगे और खाना कैसे खाओगे? कहां तुम रहते हो, उसने कहा बहुत बड़े वकील हैं उनके घर की सीढ़ी के नीचे रहता हूं। चार-पांच दिन बाद मैं वहां गया तो देखा कि भरी दोपहर में सीढ़ियों के नीचे बैठकर वह पढ़ रहा है। उसके शरीर से पसीना बह रहा है वह कैल्कुलस की किताब पढ़ रहा था।
मैंने मां व भाई से सलाह ली और उन्होंने कहा कि ऐसे बच्चों की मदद करना जरूरी है। तब हमने तय किया सुपर 30 बनाएंगे। 30 प्रतिभाशाली बच्चे जो गरीब हैं, कुछ कर नहीं पाते, 30 बच्चों का खाना-पीना कैसे होगा, मां ने कहा उनके लिए खाना मैं बनाऊंगी, मां का साथ बगल वाली एक महिला ने भी देने को कहा। तब हमने एक मकान देखा, उसमें 30 बच्चे एडजस्ट हो गए। दिन-रात पढ़ाई होती थी। खाना पारंपरिक ढंग से बनाते और खाते हैं। सफलता आने लगी फिर शुरू हुआ प्रशंसा का दौर। लोग आए डोनेशन देने को।
पहले आए मोहल्ले के लोग, फिर शहर के लोग, देश-विदेश के लोग आनंद महिंद्रा, मुकेश अंबानी आए, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने कहा चलो हमसे ले लो। हमने सोच लिया था पैसा किसी से नहीं लेंगे। स्टूडेंट्स नीरज प्रताप सिंह, अमित सिंह, प्रवीण कुमार और राहुल ने कहा हम फिजिक्स-केमिस्ट्री पढ़ाएंगे। प्रधानमंत्री ने बुलाया और पूछा कितना पैसा चाहिए। मैंने कहा कुछ नहीं, इन्फ्रास्ट्रक्चर की हमें जरूरत नहीं, पढ़ने वाला बच्चा तो बोरे पर बैठकर भी पढ़ सकता है। टीचर चाहिए और पढ़ने की इच्छा चाहिए। प्रधानमंत्री ने पीठ थपथपाई। मुकेश अंबानी ने बुलाया वे पांच लाख देने वाले थे, लेकिन हमने उन्हें भी मना कर दिया।
सफलता के मंत्र
* हाल ही में मुझे दोहा बुलाया गया था। वहां पर हाऊ टु टीच मैथेमेटिक्स में हमने अपने विचार शेअर किए थे। मेरे हिसाब से सफलता के चार मंत्र हैं। यदि स्टूडेंट्स इन पर अमल कर लें तो सफलता हासिल कर सकते हैं।
* पहला मंत्र है प्रबल प्यास। किसी भी काम में सफलता पाने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है प्रबल प्यास। आपके दिल में हर समय आईआईटी या जो भी परीक्षा की तैयारियां कर रहे हो मन में घूमती रहना चाहिए। टीवी सीरियल्स की बातें कर प्रबल प्यास को बांटना ठीक नहीं।
* दूसरा मंत्र है पॉजिटिव थिंकिंग। चाहे जो आपका लक्ष्य हो, उसके बारे में सकारात्मक सोच बनी रहना चाहिए। इसके बगैर जीवन जिया जा सकता है इसकी तैयारी भी होना चाहिए। यदि आप हताश हो गए तो मामला खत्म हो जाएगा।
* तीसरा मंत्र है अथक परिश्रम। सफल वही होगा जो अथक परिश्रम करेगा। सुपर 30 के बच्चे 14-16 घंटे पढ़ते हैं उन्हें बताना पड़ता है फिल्म देखो, संगीत सुनो फिर भी नहीं मानते। अथक परिश्रम से कुछ भी हासिल किया जा सकता है।
* चौथा मंत्र है धैर्य। स्थितियां चाहे जितनी विपरीत हो जाएं, धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। एक स्टूडेंट का आईआईटी एक्जाम में पहला पेपर खराब हो गया तो उसने दूसरे पेपर के लिए मिले तीन घंटों में धैर्य खोए बगैर दूसरे पेपर की शानदार तैयारी की और आज वह आईआईटी दिल्ली में पढ़ रहा है।
मेरा सपना
मेरा सपना है कि ऐसा स्कूल खोला जाए जहां पर छठी क्लास से स्टूडेंट्स को विधिसम्मत गणित, भौतिकी और रासायनिकी की शिक्षा दी जाए। न जाने कब सपना पूरा होगा, लेकिन विधिवत शिक्षा से उसे आज जो तकलीफें आ रही हैं, भविष्य में नहीं आएंगी।
सौजन्‍य: Super 30 founder Anand Kumar द्वारा इंदौर के एक सेमिनार में बच्‍चों के बीच दिए गए प्रेरक भाषण से साभार
(http://www.aadhiabadi.com/career-point/famous-personalities/695-super-30-founder-anand-kumar)

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