सोमवार, 14 जुलाई 2014

कहीं सूअर मरे या गाय कटे

पानी  के लिए छिड़ गयी आपस में जंग जब    
सूखी नदी का  हाकिम  ने बंटवारा कर  दिया.
नदियों को जोड़ने की तैयारियां थीं दूर
प्यासे ने सूखे होटों पे दम अपना धर दिया.

ये धर्म नाम की सोच न जाने इतनी क्यों कमज़ोर हुई ??
कहीं सूअर मरे या गाय कटे ..ये ख़तरे में पड़ जाती है.


आँखों में अक्श ले लिया है मैंने तुम्हारा
मैं भी तुम्हें मारूँगी क्या तुमने मुझे मारा.
ये सोचना न तुम कभी बच जाओगे हमसे
हर शहर में हर गाँव में है वास हमारा .


तेरी आँखों के दरिया का उतरना भी ज़रूरी था

जो डूबे आँख में उनका उबरना भी जरुरी था

पता चल जाएगा सबको फिसल कर जो गिरे इसमें

हिदायत भूल बैठे थे संभलना भी जरुरी था .

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