रविवार, 20 जुलाई 2014

इजराइल, फिलस्तीन और ईराक

     



       'क्रान्ति का निर्यात करने वाले दुनिया के नक़्शे से मिट गए अब आजादी का निर्यात करने वालों के रुखसत होने   की बारी है.'
दोस्त  ईराक पर मुझसे क्या लिखवाना चाहते हो ? जिस तरह इजराइल फिलस्तीन की जमीन कब्ज़ा रहा है क्या कोई ईराक की जमीन हड़प रहा है ? ईराक में अमेरिका की पिट्ठू सरकार को अगर ईराक के लोग ही उखाड़ फेंकना चाहते हैं तो इसमें हम क्या कर सकते हैं ? इराकी नागरिकों को अपने पसंद की सरकार चुनने का हक़ है .वो सरकार बंदूकधारी सुन्नी बनायें या शिया कठमुल्ला ये उनका काम है. उनके वहशी कारनामे  की भर्त्सना ही की जा सकती है उसके लिए अमेरिका समर्थित सरकार का समर्थन नहीं किया जा सकता है.
           हमें ये बात नहीं भूलनी चाहिए कि हम अफगानिस्तान में पहले ही काफी नुकसान उठा चुके हैं. याद करें जब सोवियत संघ की सेना अफगानिस्तान में घुस आई तो भारत सरकार रूस भारत मैत्री के कारण चुप रही. जब अफगानिस्तान के लोग अपनी आजादी के लिए लामबंद होने लगे तो हम रूस के साथ रहे. रूसी सेना वापिस गयी तो अफगानिस्तान में शिया और सुन्नी लड़ाकों में वर्चस्व की जंग छिड़ गयी. सुन्नी लड़ाकों का पलड़ा भारी होता देख भारत सरकार ने उनसे सम्बन्ध सहज करने की कौशिश की .उन्होंने यही जबाब दिया अभी हम आपस का झगड़ा निपटा लें फिर तुमसे निबटेगें,हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था जो बुरे दिनों में तुम हमारे खिलाफ रहे ?
        यही हालत ईराक की है.वहाँ तो हमने अमेरिका का वैसा समर्थन भी नहीं किया है जैसा अफगानिस्तान में रूस का किया था. वहाँ शिया राज करें या सुन्नी या दोनों ईराक का बंटवारा करके राज करें हमें दोनों से सम्बन्ध बनाकर रखना है .भारत का हित इसी में सुरक्षित है. विशाल इस्लामी राज्य की बातें हवा हवाई हैं ये सिर्फ अपने समर्थकों का हौसला बढ़ाने के लिए की जा रहीं हैं .इनका वास्तविकता से कुछ लेना देना नहीं है . वैसे सारी दुनिया के मुसलमानों के मन में ये भय समा गया है कि पश्चिमी देश उनका अस्तित्व मिटाने पर तुले हैं.मुस्लिम कटटरता और आतंकवाद का ये भी एक बड़ा कारण है और यही उन्हें एकजुट होने के लिए प्रेरित कर रहा है .

'क्रान्ति का निर्यात करने वाले दुनिया के नक़्शे से मिट गए अब आजादी का निर्यात करने वालों के रुखसत होने   की बारी है'. 

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