गुरुवार, 31 जुलाई 2014

इतिहास में आर एस एस



मैं कुछ ऐसी पोस्ट देख रहा हूँ जिसमें लिखा है कि इस तरह के सवाल नहीं पूछे जाने चाहिए जैसे मध्यप्रदेश PSC में सवाल पुछा गया कि  हेड्गावकर ने आर एस एस की स्थापना कब की थी ?
 मेरा विचार है कि अब वक्त आ गया है जब ऐसे सवाल जरूर पूछे जाने चाहियें .ऐसे सवाल पूछे जायेंगे तभी तो लोग ये जानने का प्रयास करेंगे  कि जब आर एस एस की स्थापना १९२५  में हो गयी थी तो इस संगठन ने देश के लिए क्या किया ? क्या इसने सशस्त्र  या अहिंसक तरीके से अंग्रेजों के विरुद्ध कोई लड़ाई लड़ी थी ? क्या इसके शीर्ष संगठनकर्ता अंग्रेजों की जेल में कैद रहे ? स्वतंत्रता सेनानियों ,क्रांतिकारियों, समाज सुधारकों की इन्होंने क्या मदद  की थी ? क्या बंदी या फरार  क्रांतिकरियों के परिवारों की  इस संगठन द्वारा कभी कोई मदद की गयी ? इस संगठन का वैचारिक आधार और उद्देश्य क्या है ? इसकी कार्य प्रणाली और सदस्यों की वेशभूषा का स्रोत क्या है ?
 ऐसा नहीं है कि ये सवाल पहली बार उठाये  जायेंगे .ये पहले भी उठाये जाते रहे हैं लेकिन आम आदमी तो क्या सुशिक्षित लोगों द्वारा भी इन सवालों को कोई महत्व नहीं दिया गया .वे सोचते थे देश में हजारों संगठन काम करते हैं जरुरी नहीं है कि सब स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हों फिर ऐसे संगठनों की परवाह ही क्यों की जाए जिनका समाज पर कुछ असर ही नहीं है .
लेकिन आज स्थिति पहले जैसी नहीं है. आज आर एस एस देश का एजेंडा तय कर रहा है जिस पर उसकी राजनीतिक शाखा भाजपा बिना झिझक अमल करने को तत्पर है .आज वह देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है. उसने ये अधिकार भी हासिल कर लिया है कि वह भारत के इतिहास को दुबारा लिखा सके और अपनी पसंद के संगठनों और व्यक्तियों को महिमा मंडित कर सके. लेकिन वो शायद यह नहीं जानते हैं कि अगर कोई अ आ इ ई   पढ़ना लिखना सीख जाता है तो जरुरी नहीं है कि वह सिर्फ हनुमान चालीसा ही पढ़े, वह रामायण, गीता, महाभारत भी पढ़ेगा और ये जरूर जानेगा कि महाभारत क्यों हुआ और हुआ तो किसने क्या पार्ट प्ले किया था ? विरासत पर दावेदारी यूँ ही नहीं होती है .विरासत पे अपना  दावा  करने वालों को अपना वारिसान सर्टिफिकेट देना पड़ता है और उस वारिसान सर्टफिकेट की बारीकी से तहकीकात भी होती है .यूँ ही हर चीज को अपना लिख देने चीजें अपनी नहीं हो जाती हैं. आने दीजिये जो भी काले पीले दीमक खाए दस्तावेज लेकर ये अपना सुनहरा इतिहास बताना चाहते हैं.फुटपाथ पे बिकने वाली किताबे तक समझा देती हैं कि  सच्चाई  छुप नहीं सकती कभी झूठे उसूलो से और खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज़ के फूलों से. इनके दस्तावेज भी देखे परखे जायेंगे ,सब लोग थोड़ा ही यूँ ही मान लेंगे.      

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