मंगलवार, 8 जुलाई 2014

राष्ट्रवादी मंहगाई


सितारे देख कर जब तक नजूमी आँख मिचकाये   
मुहूर्त के लिए गणना करे माथे को खुजलाये .
चलो तब तक लड़ें हम एक होकर हर मुसीबत से  
करें परवाह क्यों अच्छा मुहूर्त अब या कल आये ?   

यही तो अब हमारे वक्त की  पहली जरूरत है
लड़ेंगे एक होकर जब वही तो शुभ मुहूरत है. 
अगर दुश्मन जबर तो फिर इरादे भी हों फौलादी   
हमारे जिन्दा रहने की यही अब एक सूरत है .

जमाखोरों जमा कर लो अभी भी माल जो कम है 
ईशारा कर दिया हमने कमाने का ये मौसम है 
हमारे छापामारी के न ऐलानों से तुम डरना 
ये बातें हैं दिखावे की नहीं इनमें कोई दम है .

सुनो मंहगी अगर चीजें तो जिम्मेदार मौसम है 
कहीं बारिस बहुत ज्यादा कहीं बारिस बहुत कम है 
रहा मसला जमाखोरों का बस हमको यही कहना
वो मालिक हैं यहाँ आधे और आधे ही यहाँ हम हैं .

रही खादी में जब तक सीधी सादी थी ये मंहगाई 
मगर अब राष्ट्रवादी बन दिखाती आँख मंहगाई . 
अगर हो राष्ट्रवादी तुम करो खर्चा न यूँ चर्चा 
हमें ये बात कल एक राष्ट्रवादी ने है समझायी .


मगर न राष्ट्रवाद आया समझ न राष्ट्रवादी है
हमारे राष्ट्र में अपने लिए ही रोटी आधी है? 
कभी कोई नहीं क्यों तोंद वालों को ये समझाता 
तुम्हारी तोंद के कारण ही भूखी ये आबादी है.


ये जनता को हिदायत है हिफाजत खुद करे अपनी  
अभी सरकार कातिल की हिफाजत में परेशां है .

इंकलाबी के लिए अब ये  दो जरूरी चीज हैं 
इक कनेक्शन नेट का एक फेसबुक का पेज बस. 


मैं कदमों से उठा तो हूँ मगर घुटनों पे झुक गया 
मेरा सिर ऊँचा हो जाता मगर अपनों से रुक गया. 

   



  

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