शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

फिर भाषा की बात करें


    भाषा पर बात करना मुझे बहुत प्रिय है.आज लोक सेवा आयोग की परीक्षा में भारतीय भाषाओं के प्रयोग की माँग को लेकर जो आंदोलन जारी है उस परिप्रेक्ष्य में फिर भाषा पर बात करने का मन है. आज विवाद का विषय ये है कि लोक सेवा आयोग की प्राथमिक परीक्षा में अंग्रेजी की अनिवार्यता ख़त्म करके भारतीय भाषाओँ की परीक्षा सम्मिलित की जाए. लेकिन अंगरेजी के समर्थकों ने इसे हिन्दी थोपने के खतरे से जोड़कर यह प्रचार करना शुरू कर दिया है कि यह अहिन्दी भाषियों को स्वीकार नहीं होगा क्यूँकि वे सिर्फ अंगरेजी को ही स्वीकार कर सकते हैं हिंदी को नहीं. यद्यपि यह आंदोलन केवल हिन्दी के लिए नहीं वरन सभी भारतीय भाषाओं के लिए है लेकिन दुष्प्रचार इतना जबरदस्त है कि सच कहीं ओझल हो गया है.
अंग्रेजी के पक्ष में उनके दो मुख्य तर्क हैं कि अंगरेजी वैश्विक भाषा है और भारत को एक सूत्र में रखने के लिए आवश्यक है .उनका कहना है कि भारतीय प्रशासनिक अधिकारियों को सारे देश और विदेश में जाकर काम करना होता है इसलिए उनके लिए यह जरूरी है कि वे अंगरेजी में प्रवीण हों. उनका यह भी कहना है कि अंगरेजी ही गैर हिन्दी भाषियों को एक सूत्र में जोड़ सकती है .एक उत्तर भारतीय दक्षिण भारत में केवल अंगरेजी माध्यम से ही जनता के संपर्क में रह सकता है क्यूँकि वहाँ के लोग न तो हिन्दी में उसकी बात समझ सकते हैं न अपनी भाषा में उसे अपनी बात समझा सकते हैं .अब किसी आई ए एस अधिकारी के लिए ये तो संभव नहीं है कि वो स्थानीय भाषा को जाने इसलिए अंगरेजी ही वह माध्यम है जिससे वह अपनी जिम्मेदारी को कुशलता पूर्वक निभा सकता है .
यहाँ दो बड़े महत्वपूर्ण प्रश्न जन्म लेते हैं .पहला यह है कि ये किस आधार पर मान लिया गया है कि हमारी विदेश सेवा के लिए अंगरेजी ही उचित और एकमात्र माध्यम है.जापान ,चीन, जर्मनी,फ्रांस, अरब,ईरान कोई भी तो अंगरेजी को इस तरह नहीं अपनाता है जैसे हमने अपनाया हुआ है .क्या वहाँ के अधिकारी कम कार्य कुशल हैं ? क्या उनके वैदेशिक रिश्ते कम सहज हैं ?इसलिए ये कहना कि विदेश में काम करने के लिए अंगरेजी आवश्यक है बहुत सही नहीं है .इसके विपरीत कई बार अपनी राष्ट्र भाषा में काम न करने के लिए हमें अपमानित होना पड़ता है .अगर ऐसा न होता तो अटलबिहारी वाजपेयी संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में हिन्दी में न बोलते वो भी परम्परा का पालन करते हुए अंगरेजी में ही अपना भाषण दे सकते थे .
दूसरा प्रश्न भारत के नागरिकों से सहज संवाद और एकता बनाये रखने का है .इससे बड़ा झूठ दूसरा कोई नहीं है कि अंगरेजी सारे भारत में जानी जाती है और यह देश को जोड़े रखने के लिए जरूरी है.अंगरेजी भारत के केवल दो प्रतिशत पढ़े लिखे लोगों की भाषा है. ये दो प्रतिशत लोग भारत के आम नागरिक नहीं हैं .सही मायने में तो ये भारतीय भी नहीं हैं .ये वो लोग हैं जो भारत में खाते कमाते जरूर हैं लेकिन विचार और व्यवहार से अभारतीय ही हैं .इनके सपनों में अमेरिका और ब्रिटेन बसता है. इनका भारत के आम आदमी से कोई रिश्ता नाता नहीं है .इन्हें भारतीयों से घृणा है और उससे दूरी बनाये रखने के लिए ही वह अंगरेजी भाषा का प्रयोग करता है .यह इसलिए अंगरेजी का हिमायती है ताकि उसकी भद्र छवि और काले कारनामें सुरक्षित रहें .
भला कोई भी व्यक्ति अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त किसी अन्य भाषा में कैसे सहजता से अपनी बात कह सकता है ? इसलिए ये कहना कि दक्षिण भारतीय अंगरेजी में अपनी बात रखेंगे और ये अंग्रेजीदां उसे समझ लेंगे एक बड़े झूठ के सिवा कुछ नहीं है .हिंदी फिल्मों ने हिंदी का इतना प्रचार प्रसार किया है कि सारे भारत में गैर हिंदी भाषी काम चलाऊ हिन्दी बोल समझ लेते हैं .जो लोग नहीं बोल पाते हैं उन्हें हिंदी दुभाषियां अपने बीच में ही मिल जाता है लेकिन अंगरेजी भाषी चाहे वो उनके बीच का ही आदमी क्यों न हो एक अलग दुनिया का जीव है .वो आम आदमी से नहीं अपने रिश्ते ख़ास आदमी से जोड़ने के प्रयत्न में रहता है .उसे भी ख़ास आदमी होने की चाह अंगरेजी की ओर खींचती है.वह जनसेवा के लिए अंगरेजी नहीं सीखता है.इसलिए किसी अंगरेजी भाषी भारतीय से ये उम्मीद करना कि वो भारत के आम आदमी की मदद करेगा कोई मायने नहीं रखता है. अंगरेजी पर जो इतना जोर है वह एक ख़ास वर्ग का वर्चस्व बनाये रखने का षडयंत्र है .आखिर जो आदमी अपने देश की भाषा में काम नहीं करना चाहता है, जो आदमी स्थानीय लोगों से उनकी भाषा में संवाद नहीं कर सकता है उसे शासन और जनता के बीच के पुल के रूप में काम करने के लिए क्यों चुना जाए ? क्या देश में ऐसे काबिल लोगों की कमी है जो स्थानीय भाषा और राष्ट्रभाषा में प्रवीण हों ?और सबसे बड़ी बात ये है कि जनता से संवाद के लिए एक विदेशी भाषा को अपनाने पर जोर देने के बजाये स्थानीय भाषा का जानकार दुभाषिया रखने पर जोर क्यों नहीं दिया जाता है ? या प्रशानिक अधिकारी के लिए ये क्यों नहीं जरूरी किया जाता है कि वो एक निश्चित समय में उस राज्य की भाषा अवश्य सीख ले जिसमें उसे काम करना है.
मैं अंगरेजी भाषा के विरुद्ध नहीं हूँ और न ही उसकी जानकारी को अनावश्यक मानता हूँ लेकिन वो किसी भी तरह भारतीय भाषाओं के समकक्ष नहीं हो सकती है .उसका महत्व उतना ही है जितना चीनी ,रूसी ,जापानी या अन्य किसी विदेशी भाषा का है .बस अंगरेजी के साथ सहूलियत ये है कि उसे सीखने की सुविधा सब जगह उपलब्ध है लेकिन वह इतनी सुलभ भी नहीं है कि स्कूल की चौखट से दूर रहकर भी कोई उसे सीख ले .बम्बईयाँ फिल्मों ने हिन्दी को गाँवों, जंगलों, पहाड़ों में बसे उन लोगों तक भी पहुँचा दिया है जिनके लिए काला अक्षर आज भी भैंस बराबर है. यूँ स्वभाषा के अस्सी नब्बे प्रतिशत शिक्षित लोग भी अंगरेजी को समझने में नाकाम ही रहते हैं इसलिए उनके लिए भी अंगरेजी काला अक्षर बैंस बराबर है .वे अंगरेजी में वार्तालाप तो बिलकुल ही नहीं कर सकते हैं फिर किस आधार ये कहा जाता है कि अंगरेजी से प्रशानिक काम किया जा सकता है . बैंक,शेयर बाजार, कोर्ट, मेडिकल सब ऐसी जगहें हैं जिनमें अंगरेजी का इस्तेमाल कर के ही सबको ठगा जाता है .अगर स्थानीय भाषा का इस्तेमाल हो तो एक आम आदमी भी वकील और डाक्टर से ये पूछ सकता है कि जब मेरे कागजों में ये लिखा है तो आप ये इलाज क्यों बता रहे हो ? लेकिन नहीं अगर आम आदमी भी सब समझ जाएगा तो फिर पढ़े लिखे होने का फायदा ही क्या है ? तो साहेब समझ लीजिये ये जो अंगरेजी हैं न ये आम भारतीयों का खून पीने के लिए है. आप अपने चारों तरफ जो लाल गाल और मोटी खाल वाले लोग देखते हैं वो खून पीने वाले राक्षस हैं .अंगरेजी से मुक्ति की लड़ाई इन खून पीने वाले राक्षसों से मुक्ति की लड़ाई है. अब ये आपको तय करना है कि आप राक्षसों से लड़ने वालों के साथ हो या उन राक्षसों के साथ हो . ( कृपया 'राक्षस' शब्द को प्रचलित अर्थ में ही लें उसका गोत्र वंश न खोजें

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