गुरुवार, 14 अगस्त 2014

दिल बंटा या ये जमीं ?

कम्युनिष्टों ने कहा 'ये आजादी झूठी है.'
संघियों ने कहा 'ये खंडित आजादी है.'
दलित बोले 'हम आजाद नहीं हुए हैं .'
फिर भी हम सड़सठ सालों से आजादी का जश्न मना रहे हैं क्यूँकि हम आजाद हैं.


मुल्क को तकसीम करके दिल बंटा या ये जमीं ?
बुत बना गाँधी मगर आँखों  में अब भी है नमी.
कह रहा वो तुम मुझे कुछ दिन तो जिन्दा छोडते
सरहदों को तोड़कर, दिल जोड़ने जाते  हमीं .  

भारत की तकदीर लिखेंगे
संसद को जागीर लिखेंगे
जिसने कुल दो शेर लिखे हैं
वो भी खुद को मीर लिखेंगे .


तुम कोई भी खिताब दो गद्दार ए वतन को
हरगिज वो कभी अहले वतन हो नहीं सकते.
दामन में जिसके दाग शहीदाने लहू है
वो दाग ये खिताब कभी धो नहीं सकते .


भारत का भूगोल हमारे अंदर है 
रोज हार कर एक सिकंदर जाता है .
आसमान में जब भी पूरा चाँद  खिला 
अंगड़ाई ले उठा समंदर जाता है  



इस वादी ए कश्मीर में बारूद का धुँआ 
अच्छी नहीं सियार की शेरों से यूँ हुँआ. 

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