रविवार, 3 अगस्त 2014

संघी जमाती भाई भाई


सुना  है तस्लीमा  नसरीन को रेजीडेंट वीजा न दिए जाने से इस्लाम के जाँनिसार बहुत खुश हैं . एक अप्रत्याशित  ख़ुशी  तो उन्हें तब  भी  मिली  थी  जब  मोदी सरकार ने इजराइल  के खिलाफ  वोट  किया था.लेकिन  मोदी सरकार ने  लेखिका तसलीमा नसरीन का 2004 से मिल रहा रेज़िडेन्ट परमिट रद्द कर तो वाकई एक बड़ा तोहफा दिया है . उनको दो महीने का अस्थाई टूरिस्ट वीज़ा जरूर दिया गया है.लेकिन विश्वाश  है कि  वो आज नहीं तो कल  जरूर तस्लीमा नसरीन को अवांछित घोषित कर देश छोड़ने का हुक्म सुना देगी. मदरसों को सौ करोड़ और हज के लिए इमदाद बढ़ाकर सरकार ने ये संकेत दे ही दिए हैं कि किसी के अच्छे दिन आएं न आएं लेकिन इस्लाम के सच्चे अक़ीक़दमंदों  के लिए अच्छे दिन जरूर आएंगे.
      हम कब से  सपना देखते आ रहें हैं कि  'मंदिरों में शंख बाजे मस्जिदों में हो अजान' किसी ने कुछ किया ? इस सपने को हकीकत में बदलने के लिए किसी ने गाल बजाई के अलावा कुछ न किया .अब ऐसी सरकार आई है जिसने बगैर कुछ कहे सुने चुपके से वह काम करना शुरू कर दिया है जिससे ये सपना हकीकत में बदल जाएगा .मंदिरों में शंख बाजेगें. लाउडस्पीकर पर बजेंगे ऐसे वैसे मत समझना. सब मंदिरों के लिए शंख बजाने वाले नहीं मिलेगें तो महाभारत में बजने   वाले शंख की रिकॉर्डिंग सुना देंगे.अब ये मत कहना कि शंख की रिकॉर्डिंग कैसे सुनवाई जा सकती है ?क्या आरती रिकार्ड की हुई नहीं बजाते हैं? बजाते हैं, तो फिर शंख क्यों नहीं बजा  सकते हैं ? तो मेहरबान कद्रदान उधर मंदिरों में शंख बजेंगे और इधर मस्जिदों में लाउडस्पीकर पर अजान होगी .दीन धर्म की जय जयकार होगी. धरती से आकाश तलक जयकारे होंगे.ऐसे में किसी अबला नारी की पुकार सुनने का तो कोई मतलब ही नहीं है. वो चुप रहे या संखिया खाकर मर जाए लेकिन धर्म को आंच नहीं आनी चाहिए. इसलिए ये जो  बेगैरत औरत है न तस्लीमा नसरीन खुदा इसे जहन्नुम  रसीद करे इसे तो धक्के मारकर निकाल देना चाहिए.दुनिया का कोई देश है जो इसे अपने यहाँ बसा सके ? कोई नहीं है .हो ही नहीं सकता.सबै भूमि गोपाल की. सब जगह तो उस ईश्वर .अल्लाह ,गॉड को मानने वालें हैं, न मानने वालों का कोई मुल्क हो तो हमें बताओ ? और अगर है तो हम कहते हैं तस्लीमा नसरीन जैसी सब औरतें वहीँ चली जाएँ .यहाँ तो वही रहेगी जो पति को परमेश्वर माने. यानी पति ही ईश्वर है .और जो बिना पति के रहने  का हौसला दिखाए उसके होश ठिकाने लगाने में भला कितनी देर लगती है ? सर कलम करने के फतवे ईरान और बांग्लादेश से भले जारी होते हों लेकिन चुपचाप अमल करने में हमारा कोई सानी नहीं है . इसलिए अच्छे दिनों की आहट और गर्माहट जानने समझने की जरुरत है यूँ ही आँख बंद करके विरोध या समर्थन करने वाले खड़े खड़े हाथ मलते रह जाएंगे. साम्प्रदायिक एकता का सेकुलर लोग तो सिर्फ शौर मचाते हैं हकीकत में तो हम बदल रहें हैं.  आओ हमारे साथ मिलकर नारा लगाओ 'संघी जमाती भाई भाई, बाकी सबकी करो ठुकाई' .                  

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