शनिवार, 30 अगस्त 2014

रचनाकार: कैलाश गौतम


घर फूटे गलियारे निकले आँगन ग़ायब हो गया
शासन और प्रशासन में अनुशासन ग़ायब हो गया।
त्यौहारों का गला दबाया
बदसूरत महँगाई ने
आँख मिचोली हँसी-ठिठोली
छीना है तन्हाई ने
फागुन ग़ायब हुआ हमारा सावन ग़ायब हो गया ।
शहरों ने कुछ टुकड़े फेंके
गाँव अभागे दौड़ पड़े
रंगों की परिभाषा पढ़ने
कच्चे धागे दौड़ पड़े
चूसा खून मशीनों ने अपनापन ग़ायब हो गया ।
नींद हमारी खोई-खोई
गीत हमारे रूठे हैं
रिश्ते नाते बर्तन जैसे
घर में टूटे-फूटे हैं
आँख भरी है गोकुल की वृंदावन ग़ायब हो गया ।

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