शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2014

धर्म के धन्धेंबाजों की दादागिरी


अभी  कुछ दिन पहले मेरे पड़ौस में माँ  दुर्गा  का जगराता  किया  गया . सारी रात फुल वॉल्यूम पर लाउडस्पीकर पर माँ दुर्गा के फ़िल्मी गीतों के हनी सिंह टाइप पैरोडीनुमा भजन गाये गए. गायक नशे में लहरे ले लेकर   गा रहे थे और भक्तगण जिसमें युवा लडकें लड़कियों और बहुओं की काफी बड़ी  संख्या  थी ताल दे देकर रात भर  ठुमकते रहे. मेरे जैसे नास्तिक ने  घर  पर करवट बदलते हुए सारी रात कैसे गुजारी होगी इसका एहसास किसी आस्तिक को कभी नहीं हो सकता है .जब किसी बीमार आदमी या किसी परीक्षा  की तैयारी कर रहे बेरोजगार नौजवान की मानसिक पीड़ा की परवाह  इन धर्म के धन्धेंबाजों को नहीं होती  है तो एक नास्तिक की परवाह ही इन्हें क्यों कर हो सकती है ? लेकिन जहाँ तक मुझे पता है कानूनन  रात दस बजे के बाद आप लाउडस्पीकर पर तेज आवाज में शौर नहीं कर सकते हैं. लेकिन न तो धार्मिक लोग ऐसे किसी क़ानून  को मानते  हैं और न ही क़ानून  के रक्षक  क़ानून  भंग  करने  वाले इन धार्मिक उन्मादियों पर अंकुश लगाते हैं .हाँ अगर अपनी पीड़ा के चलते  कोई इन्हें ऐसा न करने के लिए टोक दे तो ये तुरंत मारपीट पर उतारू हो जाते हैं और क़ानून के रक्षक तुरंत ऐसे कथित धार्मिक आयोजन को  सकुशल संपन्न कराने के लिए मुस्तैद हो जाते हैं. अगर किसी की  आस्था को चोट पहुँचाना अपराध है तो फिर अपराधी वो लोग भी हैं जो शान्ति पूर्वक रह रहे नास्तिक और धर्म निरपेक्ष लोगों को आये दिन मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हैं. एक नास्तिक आदमी किसी भी तरह  किसी आस्तिक को दुःख नहीं देता है जबकि आस्तिक रोज ऐसा करते हैं . धर्म के धन्धेंबाजों की यह दादागिरी बंद होनी चाहिए.                

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