रविवार, 12 अक्तूबर 2014

स्कूल न जाने के बारे में सोच ही नहीं सकती'---मलाला


'स्कूल न जाने के बारे में सोच ही नहीं सकती'---मलाला यूसुफजई [नोबुल शान्ति पुरस्कार विजेता ]

[वह पाकिस्तान की बहादुर बेटी हैं। 11 साल की उम्र से ही उन्होंने गुल मकाई के नाम से बीबीसी उर्दू के लिए डायरी लिखकर तालिबान के खिलाफ अपनी अहिंसक जंग का ऐलान किया। लड़कियों की शिक्षा की वकालत के बदले मलाला यूसुफजई तालिबानी हमले का शिकार बनीं। नोबेल अकादमी ने उन्हें साल 2014 के नोबेल शांति सम्मान से नवाजा है। पिछले साल बोस्टन की जेएफके लाइब्रेरी में रॉबिन यंग ने उनसे बातचीत की थी। पेश हैं, इंटरव्यू के अंश: ]

रॉबिन यंग-- खतरों और धमकियों के बावजूद आप यह सब कैसे कर पा रही हैं?

मलाला - तमाम तरह के प्रोग्राम में शरीक और मसरूफ होने के बावजूद हमारी मंजिल बेहद अहम है। वह मंजिल है- सभी बच्चों को तालीम हासिल कराना। इसका मतलब यही नहीं है कि हम उन्हें स्कूल भेजें, बल्कि उनके भविष्य को भी बनाएं। इसके लिए मुझे काफी सारे काम करने की जरूरत है और मैं कर रही हूं। जब मैं अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिली, तो उन्हें कहा कि अफगानिस्तान में बंदूक और बम भेजने की जगह आप कॉपी, कलम और शिक्षक क्यों नहीं भेजते? मैंने उनसे कहा कि दहशतगर्दी से लड़ने का यही सबसे कारगर तरीका है।
रॉबिन यंग-- स्वात और पख्तून के आपसी जुड़ाव में आप क्या मजबूती देखती हैं?

मलाला - अगर हमारे इतिहास को देखें, तो सबसे पहले हम पख्तून हैं, क्योंकि कई सदियों से पख्तून है। फिर इस्लाम आया। पाकिस्तान तो अब बना है। हम पाकिस्तान को अपना होमलैंड मानते हैं। स्वात बहुत खूबसूरत जगह है। आप वहां जाएंगे, तो उस जगह से मोहब्बत करने लगेंगे। जब मैं वहां थी, तो यह एहसास न था कि जन्नत में रह रही हूं। वे हरी-भरी वादियां, ऊंचे-ऊंचे पहाड़, मैं कभी नहीं भूल सकती। मुझे ब्रिटेन लाया गया और जब मैंने यहां की सड़कों को देखा, कृत्रिम जंगलों और पार्कों को देखा, तब मुझे एहसास हुआ कि स्वात बेहद खूबसूरत कुदरती इलाका है। अब मैं स्वात को मिस करती हूं। ..क्या वक्त था! हमारा परिवार स्वात में रहता था, भारी बस्ता उठाकर मैं स्कूल जाती थी, अपना होमवर्क करती थी। तब वह मेरी जिंदगी का आम हिस्सा था। लेकिन 2007 में वहां दहशतगर्दी शुरू हुई और तालिबान ने हमें स्कूल जाने से रोका। जनवरी, 2009 में उन्होंने रेडियो पर ऐलान किया कि अगर 15 जनवरी, 2009 के बाद कोई लड़की स्कूल गई, तो आप जानते ही हैं कि हम क्या कर सकते हैं। और उन्होंने स्वात इलाके में 400 से अधिक स्कूलों में धमाके किए। वे महिलाओं के साथ बदतमीजी करने लगे, उन्हें बाजार तक नहीं जाने देते। लोगों को सरेआम मार दिया जाता। औरतों की आजादी पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी गई। उस वक्त भी मैं हमेशा के लिए स्वात छोड़कर नहीं जाना चाहती थी। हम कहते थे कि एक दिन तो मरेंगे ही और तालिबान यों छोड़कर जाने वाले नहीं हैं, इसलिए औरतों के हक के लिए हम बोलें। अपने हक के लिए लड़ें, अमन-शांति के लिए संघर्ष करें और तब मरें।

रॉबिन यंग - आपके लिए स्कूल का मतलब क्या रहा?

मलाला - मैं अलग-अलग घरों में रही। यानी हमारे घर किराये के थे। जब मकान मालिक कहता कि घर खाली करो, तब हम दूसरे घर में चले जाते। ज्यादातर घर स्कूल के आस-पास ही रहे। मैं यह कह सकती हूं कि मेरे बचपन का बड़ा हिस्सा स्कूल में ही बीता। जब मैं छोटी थी और ठीक से भाषण नहीं दे पाती थी, तब अम्मी मुझे स्कूल ले जातीं और कहतीं कि इन खाली कुरसी-बेंचों के सामने अपना भाषण दो। इस तरह से मेरी परवरिश हुई। इसलिए स्कूल न जाने के बारे में मैं सोच ही नहीं सकती थी। जब मैं स्कूल जाने लगी, तो वहां के माहौल से एक किस्म का प्यार हो गया। मैं वहां बहुत कुछ सीखने लगी। मैं सिर्फ एबीसीडी, केमेस्ट्री, फिजिक्स ही नहीं पढ़ रही थी, बल्कि यह भी सीख रही थी कि हमारी जिंदगी की बुनियादी चीजें क्या हैं? यह भी सीख रही थी कि हमारे साथ पढ़ रही सारी लड़कियां बराबर हैं। आप लड़का हैं या लड़की, कोई अंतर नहीं है। आप गोरे हैं या काले, आप मुस्लिम हैं या ईसाई, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं यह सीख रही थी कि हमें एक-दूसरे का सम्मान कैसे करना चाहिए, बड़ों और शिक्षकों के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए। यह सिर्फ मैं नहीं सीख रही थी, बल्कि हर लड़की सीख रही थी। हम सिर्फ लिख-पढ़ नहीं रहे थे, बल्कि अपना भविष्य भी बना रहे थे। हम अपने मुल्क पाकिस्तान का भविष्य बना रहे थे। इसलिए मैं अपने स्कूल से मोहब्बत करती थी। ठीक है कि मैं सबसे अधिक अंक लाती थी, पर एक-दो बार ऐसा भी लगा कि इतनी पढ़ाई की क्या जरूरत है? कोई कहता कि जिस नई लड़की ने दाखिला लिया है, वह तुम्हें पीछे छोड़ देगी। पर मुझे लगता कि ऐसा नहीं हो सकता, पर हुआ। कई बार हमें लगता है कि हमारा पोजीशन बरकरार रहेगा, लेकिन यह सच्चई है कि उसे बरकरार रखने के लिए आपको लगातार मेहनत की जरूरत पड़ती है।

रॉबिन यंग -- आपको टीवी प्रोग्राम की स्टार ‘अगली बडी’ अमेरिका फेरारा क्यों पसंद है?

मलाला - सबसे पहले उन्हें अगली बडी नहीं, प्रेटि बडी कहना चाहिए। वह बहुत अच्छी और उदार है। जब मैं उनसे मिली, तो चौंक गई कि अरे, यह टीवी पर अगली बडी बनती हैं।.. जब स्वात की हालत बद से बदतर होती जा रही थी, दिन-ब-दिन दहशतगर्दी बढ़ती जा रही थी, हर दिन तीन-चार लोगों की घाटी में हत्या हो जाती थी, हम हर दिन खबर सुनते कि इस या उस स्कूल में धमाका हुआ, तब हम दहशत की इस दुनिया से बाहर निकलना चाहते थे। हम दूसरी दुनिया को देखना चाहते थे और टीवी शो अगली बडी देखकर हमें लगता था कि यह हमारे सपनों की दुनिया है। उनके फैशन और कपड़ों को देखकर लगता कि वहां वैसी समस्या तो है ही नहीं, जैसी स्वात में है। हमें लिपिस्टिक की परवाह नहीं थी, बल्कि हम तो अपनी घाटी में शांति चाहते थे। इसलिए यह टीवी शो हमें पसंद आता था।
                        साभार : दैनिक हिन्दुस्तान दि0  12-10-12

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