शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

सोशल मीडिया में प्रेम प्रसंग



.काफी दिनों से सोशल मीडिया में मेरठ के एक अन्तरधार्मिक प्रेम प्रसंग पर चर्चा है। मुझे भी इस सम्बन्ध में कुछ नजदीकी समबंधियों से जानकारी हासिल हुई है। उस जानकारी को बयान करने की अपेक्षा मैं वस्तुस्थिति का अपनी समझ से विश्लेषण करना जरूरी समझता हूॅं। इसी के साथ मैं एक ओर घटना को भी साझा करना चाहूॅंगा ताकि मैं अपनी बात ज्यादा स्पष्ट तरीके से समझा सकूॅं।
अन्तरधार्मिक निजी सम्बन्धों वाली पहली घटना जिसने मीडिया और राजनीतिक व्यक्तियों की मेहरबानी से कई रूप् बदलें हैं तथा जिसके वास्तविक रूप् के बारे में सिर्फ कयास ही ज्यादा लगाये गये हैं और स्थिति भी ऐसी है कि सिर्फ कयास ही लगाये जा सकते हैं कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता है। उस परिवार की थोडी सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि भी जान लेने चाहिये जिसकी इस पूरे प्रकरण में कही कोई चर्चा नहीं है। यह परिवार उच्च सवर्ण जाति का लघु कृषक परिवार है। इस लडकी का पिता एक गैर जिम्मेदार,शराबी और काहिल किस्म का आदमी है जिसकी संगत बहुत खराब है। जिसके कारण परिवार का माहौल और आर्थिक स्थिति दोनों ही बहुत खराब है।
भारत के मध्य वर्गीय समाज में जिस परिवार के मुखिया का ऐसा हाल हो उस परिवार में स्त्रियों की मान मर्यादा बहुत सुरक्षित नहीं रहती है। एक तरफ उच्च सवर्ण जाति के होने का सामाजिक दबाव उन्हें अपने कदम घर से बाहर नहीं निकालने देता है दूसरी ओर घर के हालात उन्हें चैन से जीने नहीं देते है। ऐसी स्थिति में एक जिम्मेदार युवा पीढी अपनी क्षमता और पहुॅंच के सहारे आत्मनिर्भर होने के लिये जो कुछ कर सकती है वो सब इस परिवार के लडके लडकी ने किया है। अब ये अलग बात हैं कि परिस्थितियों ने ऐसा मोड ले लिया जिसके कारण उन्हें सामाजिक प्रताडना झेलनी पडी है। लेकिन ये तो बेराजगारी और युवा सम्बन्धों की कडवी सच्चाई है। अगर ऐसे सम्बन्ध अन्तरजातिय हैं तो खाफ पंचायत सजा सुना देगी और अगर ये अन्तर धार्मिक हैं और उसमें भी अगर ये अल्पसंखयक वर्ग से जुडा है तो धर्म के लठैत तूफान खडा कर देंगे। लेकिन कोई भी आर्थिक, सामाजिक और मानसिक विकलांगता की ओर ध्यान नहीं देगा और न ही उसे दूर करने में सहयोग करेगा. इस मामलें में साम्प्रदायिक राजनीति की रोटियॉं सेंकी गई और अन्ततः उस परिवार के सामाजिक बहिष्कार का ही फरमान सुना दिया गया। अब कोई बताये इससे कैसे तो धर्म की रक्षा होगी और कैसे उस परिवार या समाज के हालात सुधरेंगें । मैं तो कहता हॅं कि इससे हालात और बिगडेगे लेंकिन इस की परवाह ही कौन करता है?
दूसरे प्रकरण में भी समाज ने बहिष्कार का फैसला सुनाया। यहॉं मामला दो सुशिक्षित परिवारों के सुशिक्षित बच्चों के प्रेम विवाह का था। विधि स्नातक लडकी एक उच्च सवर्ण सुशिक्षित परिवार की इकलौती सन्तान है। लडकी की मॉं राजकीय डिग्री कालिज में प्रोफेसर है और पिता प्रगतिशील विचारधारा का सामाजिक कार्यकर्ता है। जबकि अनुसूचित जाति का यह लडका हार्डवेयर इन्जीनियर है और उसके माता पिता उच्च पदों पर कार्यरत हैं। लडके और लडकी ने परस्पर प्रेम विवाह करने की इच्छा अपने अभिवावकों से व्यक्त की तो दोनों ही परिवारों ने उनकी इच्छा को सर्वाेपरि मानते हुये विवाह की सहमति दे दी । इस बीच जब सवर्ण परिवार की इकलौती लडकी के कुटुम्ब वालों को इस रिश्ते की जानकारी मिली तो उन्होंने लडकी के माता पिता को इस सम्बन्ध को तोड देने के लिये चेतावनी दी लेकिन उनके इन्कार करने पर उन्होने अपने जाति भाईयों को इकटठा कर उन्हें जाति से बहिष्कृत करने की घोषणा करा दी। उनकी जाति में खाफ चौधरियों जैसा कुछ नहीं हैं वरना वो इससे कही ज्यादा सख्त सजा सुनाते. लेकिन क्यूॅंकि परिवार आर्थिक दृष्टि से मजबूत था और प्रगतिशील विचारधारा के सम्पर्क में होने के कारण मानसिक दृष्टि से भी मजबूत था इसलिये वो किसी तरह के दबाव में नहीं आया। वहॉं जातिय या साम्प्रदायिक राजनीति की रोटियॉं बेलने की भी कोई गुॅंजायश नही थी। इसलिये थोडे दिनों की उछलकूद के बाद सारा मामला टांय टांय फिस्स हो गया। आज अन्तरजातिय विवाह सम्बन्ध जोडने वाले दोनो परिवार उसी तरह रह रहे हैं जिस तरह बाकि आम लोग रहते है।
लगे हाथ एक ओर घटना का भी जिक्र कर दूॅं जो सोशल मीडिया पर मर्दानी/ बहादुर महिला के नाम से चर्चित रहा। संयोग से ये महिला भी मेरी पूर्व परिचित है। मैं इसे बचपन से जानता हूूॅं। यह वाकई में बहादुर महिला है। इसका आत्म विश्वाश गजब का है। यह बचपन से ही समाज विरोधी और दकियानूसी तत्वों का सामना करते हुए बड़ी हुई है लेकिन किसी तरह की औपचारिक सुशिक्षा से वंचित रहने के कारण किसी ख़ास तरह का वैचारिक रुझान नहीं है और न ही वैज्ञानिक चेतना से लैस है. अत अपनी सहज अनुभूति से जो सही समझ सकती है उसी के अनुरूप व्यवहार करती है .सरकार विरोधी तत्व इसे मोहरा बनाकर सरकार को घेरना चाहते थे लेकिन सरकार ने त्वरित कार्यवाही की और आरोपियों को गिरप्तार करने की कोशिश तेज करते हुये महिला को एक लाख रूप्ये के पुरस्कार से नवाजने की घोषणा भी कर दी। संघी कबीला इस पर भी चुप बैठने वाला नही था लेकिन संयोग से महिला यादव जाति से है और किसी भी तरह से उनका मोहरा बनने के लिये तैयार नहीं है। अब अपनी आदत के मुताबिक सरकार विरोधी संघी कबीलें ने तुरन्त पलटी मारी और आरोपियों को सरकारी कार्यवाही के संगठित विरोध के लिये उकसाकर मामले को दूसरा रंग देने का प्रयास किया। कुछ दिन बाद ये मामला भी गटर में चला गया और संघी अपने मनसूबे में सफल नहीं हो सके।
ये वो तीन घटनायें जो मेरे काफी नजदीक घटी हैं और जिन पर मैंने पहले एक भी शब्द नहीं लिखा था लेकिन आज यह बताने के लिये मैं यह सब लिख रहा हूॅं कि इनमें से जो परिवार प्रगतिशील विचारधारा के सम्पर्क में था और आर्थिक रूप् से आत्मनिर्भर था वह विचलित नहीं हुआ। उसने हर झंझावात का डटकर सामना किया और हू हू करने वाले हुदहुद की तरह उमड घुमड कर चले गये।उनकी जिन्दगी आज भी आराम से गुजर रही है लेकिन जो कमजोर आर्थिक हालात और वैचारिक सोच वाले थे उनका इस्तेमाल अवसरवादी लोगों ने अपने लिये किया और उनके हाथ रूसवाई के सिवा कुछ भी नहीं आया है।
.अब आप ही तय कीजिये आप कैसा समाज चाहते हैं? एक धर्मभीरू पराश्रित लोगों का या आत्मनिर्भर स्वाभिमानी प्रगतिशील सोच वाले लोगों का ? -------- अमरनाथ 'मधुर'

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