शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2014

क्या गलत कहा था गाँधी ने

 
  क्या गलत कहा था गाँधी ने कि बंटवारा उनकी लाश पर होगा ? क्या बंटवारा उनकी  लाश पर नहीं हुआ ? बंटवारें में जितने भी लोग मारे गए वो सब गाँधी थे. कोई गोडसे, कोई सावरकर, कोई गोलचक्कर, कोई जिन्ना नहीं मारा  गया. गाँधी तो बंटवारे के साथ ही मर गया था.  जो दिखता  था वो एक चलती फिरती लाश था .लेकिन कुछ सिरफिरों को लगा कि अब इसकी भी क्या जरुरत है ? उन्होंने मरे हुए को भी मार दिया . लेकिन मरते ही  चमत्कार हो गया.  गाँधी की लाश जिन्दा गाँधी से ज्यादा भारी हो गयी. अब उसे टुकडे टुकडे कर हर चौराहे पर खड़ा कर दिया गया है. जिन्हें माला डालने की जरुरत पड़ती है वो माला डाल आते हैं, जिनका गालियाँ देते देते  हलक सूख जाता   है  वो खिसियाकर  जूते मार  आते हैं. जो कम हिम्मत हैं वो रात के अन्धेंरे में उसका चश्मा या छडी छीन ले जाते हैं .बस अब गाँधी इतने ही काम  का है. उसके सिद्धांतों से, कार्यक्रमों से किसी को कुछ मतलब नहीं है. गाँधी जिन्दा तो है नहीं जो किसी से कुछ कहते या अनशन पर बैठते. वो तो अब लाश भी नहीं रहे,पत्थर की मूरत हैं, जो कभी कभी अन्धेंरे में चमकने लगती है. अँधेरे से घबराये लोग उसकी तरफ आंख फाड़कर देखने लगते हैं कि हैं ऐसा इंसान भी कभी इस धरती पर था जो कभी किसी बुरे वक्त में न घबराता था .नयी राह खोजता और सब को  उस राह पर चलने के लिए कहने से पहले आगे आगे स्वयं चलता था . गाँधी और उसके रास्ते को सारी दुनिया के लोग आज भी याद करते हैं और चाहते हैं कि कोई उनके आगे गाँधी की लाठी पकड़कर चले .
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गाँधी जयंती को 'स्वच्छता दिवस' मनाया गया .सारे संसार में यह दिन 'विश्व अहिंसा दिवस' के रूप में मनाया जाता है . यह विश्व शान्ति के लिए गांधीजी के अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने के लिए मनाया जाता है लेकिन भारत में  अहिंसा को महत्व देने की जरुरत शायद अब नहीं रही है .यहाँ अब बात बात पर लड़ाई की हुँकार भरी जाती है .हमेशा मुठभेड़ के मौके तलाशें जाते हैं . कुछ नेताओं को लगता है कि कुछ हिंसा होगी ,कुछ खून बहेगा तो उनके लिए वोट  की फसल तैयार हो जायेगी जिसे वो अगले चुनाव में काट लेगें. इसलिए 'अहिंसा दिवस' नहीं उन्होंने 'स्वच्छता दिवस' मनाना ज्यादा उचित समझा . स्वच्छता वैसे जरूरी है लेकिन क्या ही अच्छा होता कि ये  आने वाली 'बकरीद' को 'स्वच्छता दिवस' मनाया जाता .उस दिन सार्वजनिक स्थानों को  स्वच्छ रखने की बड़ी जरुरत होती है . ये अहिंसा को तो शायद न स्वीकारें लेकिन स्वच्छता  से  तो कोई इंकार ना करेगा. इस विषय पर काफी पहले मेरी अपने एक मुसलमान दोस्त से वार्ता हुयी थी. उसने कहा था 'मधुर भाई मुसलमान तो जमीन का गिद्ध है .कोई मुसलमान दस किलो दूध देने वाली गाय या भैंस को नहीं काटता है .वो तो उस जानवर को काटता है जिसे तुम बेकार बीमार जानकर बेच देते हो या पंडित को दान कर देते हो . अब जब आप उसे नहीं रख सकते थे तो लेने वाला उसका क्या करेगा ? वो उसे अपनी लुगाई बनाकर तो रखेगा नहीं ? वो उसे बेच देगा जो बिकते बिकते अंतत: कसाई के पास ही पहुंचती है .कसाई उसे काटकर  उसका गोश्त बेच लेता है ,खाल बेच लेता है. गरीब मुसलमान उस गोश्त को ही खाता है और उस बीमार जानवर के गोश्त को खाकर अपने लिए बीमारियां पाल लेता  है लेकिन बाकी समाज के लिए तो गिद्ध की तरह सफाई का काम कर ही देता है .अगर वो न हो तो तुम्हारी बूढी गाय माता सडकों पर पड़ी सड़ती रहे कोई उसे देखने भालने वाला न मिलेगा.'
 मैं सोचता हूँ जिस समाज में अपने बूढ़े माता पिता की सेवा का भाव ख़त्म हो रहा हो वो समाज गाय माता को बचाने के नाम पर हल्ला चाहे जितना मचाये लेकिन उसे अपने घर में रखकर दाना चारा नहीं खिला सकता है .ऐसे  धर्म रक्षकों के पाखण्ड को क्या कहा जाए ? स्वच्छता और अहिंसा दोनों का समाज में महत्व है लेकिन इसे हासिल कैसे किया जाएगा जब  कुछ लोगों की धार्मिक आस्था इससे आहत होती है ?


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