सोमवार, 3 नवंबर 2014

कातिल जब चाहे

'कातिल जब चाहे खुद की शक्ल बदल सकता है
ऐसी शक्लें की पहचानो तो पहचाने न बने
ऐसे चेहरे के जो इंसान से पहचाने न बने
ऐसे नारे जो भुलाने से भुलाए न बने .'

"साहिर" साहब से बहुत ही माज़रत के साथ उनकी मशहूर नज़्म " खून फिर खून है, टपकेगा तो जम जाएगा" में कुछ छेड़ छाड़ और तब्दीलियों के साथ हालाते हाज़ेरा पे एक तुकबंदी - फैजी रेहरवी.

ज़ुल्म बस ज़ुल्म है, छपता है फिर बिक जाता है
खून फिर खून है , टपकेगा और धुल जाएगा

वादिये गुजरात में धुले या अयोध्या में धुले
कभी मेरठ में धुले तो कभी बलिया में धुले
तेग़-ए - बेदाद पे या लाशे इशरत पे धुले

खून फिर खून है, टपकेगा और धुल जाएगा

लाख आये रोज़ छप छप के जो अखबारों में
हुकूमत छुपा देती है जल्लादों के मसकन का सुराग
चंद सिक्कों में ओढ़ा देती हैं सुबूतों को नक़ाब
चाहे लेके हर बूँद भटकती रहे हथेली पे चेराग

तुमने जिस खून को गुजरात में दबाना चाहा
आज देखो, वो दिल्ली तक आ निकला है
कभी तरक्क़ी कभी मज़हब कभी नमो नमो बन के
खून चलता है तो रुकता नहीं संगीनों से
जो दबाओ तो दब भी जाता है चन्द दलीलों से

खून की बात ही क्या , खून की औकात ही क्या
खून बस पानी है, आग़ाज़ से अंजाम तलक
कातिल जब चाहे खुद की शक्ल बदल सकता है
ऐसी शक्लें की पहचानो तो पहचाने न बने
ऐसे चेहरे के जो इंसान से पहचाने न बने
ऐसे नारे जो भुलाने से भुलाए न बने

खून फिर खून है , टपकेगा और धुल जाएगा
ज़ुल्म बस ज़ुल्म है, छपता है फिर बिक जाता है
                                            - फैजी रेहरवी
[हैदर  रिज़वी  की वाल से साभार ]

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें