रविवार, 23 नवंबर 2014

संघी सरकार का गरीबी का रेखांकन


   सुना है सरकार ने  बाइक रखने   वालों   तक   को    अमीर     आदमी     की श्रेणी     में गिनते   हुए   उसे   रसोई   गैस   सिलेंडर   पर मिलने   वाली   सब्सिडी   से वंचित   करने का मन   बना   लिया   है .सरकार का वही पुराना तर्क है कि सब्सिडी का बोझ अर्थव्यवस्था बर्दाश्त नहीं कर सकती है इसलिए समाज के कमजोर तबके को छोड़कर किसी को सब्सिडी नहीं दी जा सकती है .सिद्धांत : सरकार के इस फैसले में कोई बुराई नहीं दिखती है .आखिर   सबको सब्सिडी क्यों दी जाए ? लेकिन एक दो सवाल हैं जिन्हें सरकार को उत्तर देकर स्पष्ट कर देना चाहिए .सबसे पहला तो यही है कि रसोई गैस का वास्तविक उत्पादन  लागत मूल्य क्या है और उस पर कितना मुनाफा उत्पादन ,शोधन और वितरण  करने वाली कंपनियों द्वारा वसूला जाता है? अगर   उत्पादन लागत में उचित  प्रतिफल जोड़कर मूल्य निर्धारित  किया  जाए तो किसी को उस मूल्य   पर सिलेंडर खरीदने में कोई आपत्ति   नहीं होगी  . वह   मूल्य इतना   अधिक    भी न होगा  जितना  आज  वसूला जाता है .
दूसरा ये कि क्या सरकार गरीबी के यही मानक आवास प्राधिकरणों और निगमों के भवन आवंटन और किश्त निर्धारण में भी अपनाती है या उसके मानक कुछ अन्य  हैं ? सरकार और कार्पोरेट जगत जब माध्यम और निम्न माध्यम आय वर्ग की बात करता है तो उसकी परिभाषा में जो लोग आते हैं वो इस हिसाब से अमीरतम लोगों में गिने जाने चाहियें क्यूँकि बाइक तो दिहाड़ी मजदूर तक रखते हैं वो न हो तो सुबह   सवेरे  शहर   में  चौराहों पर आकर मजदूरी के लिए खड़े न हो सकें .  

   सब्सिडी   कभी   भी  आम  आदमी के लिए  बहुत मददगार नहीं होती है.  व्यवहारिक रूप से इसका सबसे ज्यादा हिस्सा अमीर लोगों को मिलता है .बिजली, गैस, डीजल या पेट्रोल का सबसे ज्यादा उपभोग अमीर आदमी अपनी सुख सुविधा या उद्योग व्यापार में मुनाफा कमाने के  लिए करता है .मुनाफे का उपयोग और अधिक मुनाफा कमाने या अधिक उपभोग करने में इस्तेमाल होता है जिसका दबाव प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ता है और गरीब के लिए उन संसाधनों की उपलब्धता सीमित हो जाती है.इसलिए सब्सिडी को वस्तु के मूल्य पर देने की अपेक्षा उसे सीधे उपभोक्ता के खातें में जमा करना उचित होगा. इससे यह भी पता चल सकेगा कि तमाम तरह की सब्सिडी मिलाकर कुल कितनी सब्सिडी एक व्यक्ति या परिवार को प्राप्त हो रही है .अभी तो जीतनी सब्सिडी एक गांव के सारे लोगों को मिलती है या झुग्गी झोंपड़ी वालों की पूरी बस्ती को मिलती है उतनी सब्सिडी शहर के चाँद अमीर हड़प कर जाते हैं .एक अमीर परिवार जनरेटर के रूप में जितना डीजल फूंका है उतने में कई सौ एकड़ खेत की सिंचाई हो सकती है .इसलिए सब्सिडी के वर्तमान रूप को तो खत्म कर ही देना चाहिए लेकिन गरीबों को समुचित राहत जरूर मिलनी चाहिए .     

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