शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

पण्डित नेहरू और संघ के दुष्प्रचारक

सरकारी मीडिया तंत्र का सरकार द्वारा अपने एकतरफा प्रचार के लिए इस्तेमाल करने का काम प्रत्येक सरकार के समय होता रहा है लेकिन आज प्राइवेट न्यूज चैनल भी सरकार के ऐसे भोंपू नजर आते हैं जो सत्तारूढ़ पार्टी के तथ्यहीन दुष्प्रचार में बढ़ चढ़कर भाग लेते हैं .इसका सबसे बड़ा प्रमाण ये है कि केंद्र में जब से आर आर एस एस की विचारधारा वाली भाजपा सरकार सत्तारूढ़ हुई है वे हर मसाले पर संघ के नजरिये को देश के बहुसंखयक लोगों की राय बताने में जुट गए हैं. यहाँ तक कि राष्ट्रनायकों की कुर्बानी और सोच को भी दूषित बताने से बाज नहीं आ रहे हैं .
अभी इकतीस अक्टूबर को पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा के शहादत दिवस पर अनेक टी वी चैनल उनकी हत्या से ज्यादा दिल्ली में सिखों के साथ हुई ज्यादती को बेशर्मी से प्रचारित प्रसारित करते रहे जिसका उद्देश्य पीड़ित सिक्खों के परिजनों के जख्मों को कुरेदकर इंदिरा गांधी के बलिदान के महत्व को कम करने के अतिरिक्त और कुछ न था.
पंडित जवाहर लाल नेहरू के जन्म दिवस पर भी नेहरू जी की कश्मीर और चीन नीति को लेकर तत्कालीन परिस्तिथियों की विवेचना किये बिना अनर्गल आलोचना जारी है . संघ के दुष्प्रचारक जिन्हें मीडिया में विचारक कहा जाता है इस काम में बड़ी मुस्तैदी से जुटे हैं और मीडिया उनके फैलाये झूठ को उजागर करने की बजाये उस झूठ को प्रचारित प्रसारित करने में लगा है . क्या मीडिया का यही काम है ?
इतिहास और इतिहास नायकों के प्रति संघ का एक विशेष नजरिया है जिससे किसी भी पढ़े लिखे समझदार व्यक्ति की सहमति होनी मुश्किल है .यद्यपि संघ के समर्थक भी देश में काफी हैं लेकिन उनकी एकरंगी सोच को तथ्यों पर तरजीह देकर इतिहास की व्याख्या करना और फिर उसे सारे देश पर थोपना देश की जनता स्वीकार नहीं करेगी . आज जिस तरह के संघी कुप्रचार में मीडिया सहभागी बन रहा है कल हो सकता है यह महात्मा गांधी की हत्या को स्वाभाविक बताने की संघ की मुहीम में भी यह इसी बेशर्मी से शामिल रहे तब इस विचारधारा के समर्थकों को बड़े जोर शौर से केंद्र में सत्ता तक पहुंचाने वाली आम जनता को अपना सिर धुनने के अलावा कोई अन्य उपाय नजर नहीं आएगा. मैं ये कोई कपोल कल्पित बात नहीं कह रहा हूँ यह बहुत जल्द सबके सामने होने वाला है .
यूँ मेरे उपरोक्त कथन के विपक्ष में दो बातें भी हो सकती हैं .पहली यह कि हो सकता है कि हम एक दूसरे तरह के प्रचार प्रसार के माहौल में बढे हुए हों जिससे हमारी सोच को इतना परिपक्व कर दिया है कि उसमें नए तथ्यों को जानने समझने का धैर्य ही नहीं हो  . इसलिए ही शायद हम अपने राष्ट्र नायकों के कृत्यों को तटस्थ   रूप से नहीं आंक पाते हों .
दूसरी यह कि संघ के प्रति हमारा नजरिया पूर्वाग्रह से ग्रसित हो और उसकी हर बात का विरोध करने को हम आदि हों .
अगर ये दोनों बात सही भी हों जिनके गलत होने का हमें पूरा विश्वाश है, तब भी इतना तो किया ही जा सकता है कि हर काम को हर बात को वक्त की जरुरत के हिसाब से नापा तौला जाये. क्या किसी की हत्या को वो चाहे दिल्ली में सन चौरासी में मारे गए सिखों की हो या इंदिरा गांधी की या अन्य किसी की भी क्यों न हो उसे स्वाभाविक बताना जरूरी और उचित है ?हत्या से हत्या के औचित्य को अगर सिद्ध किया जाएगा तो यह सिलसिला इतनी दूर तक जाएगा जिसका कोई अंत न होगा .महात्मा गांधी का जीवन और शहादत हत्या से हत्या को सही बताने की सोच के ही विरुद्ध था और ऐसी विचारधारा जो इसे सही मानती हो सही नहीं हो सकती है . इसलिए मीडिया को चाहिए कि वह ऐसी विचारधारा का वाहक न बने और जन हित में काम करे जिसकी उससे सबसे ज्यादा अपेक्षा रहती है . यही पत्रकारिता धर्म है .

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