शनिवार, 15 नवंबर 2014

'यह देश किसी की जागीर नहीं है'

   दो नजरिये : आपकी राय क्या है ?
         
   1 -   'यह देश किसी की जागीर नहीं है' --- अमरनाथ  मधुर

एक हजार साल पहले आने वाले वाले मुसलमान विदेशी तो उससे पहले आने वाले लोग विदेशी क्यों नहीं? माजी ने गलत क्या कहा?
 मांझी ने यह  गलत कहा है.  क्यूँकि  अगर  एक हजार और पांच हजार साल पहले आने वाले विदेशी हैं तो उससे पूर्व दस हजार साल या एक लाख साल पहले आने वाले भी विदेशी ही हैं .जिन्हें आदिवासी, मूल निवासी कहा जाता है वो  भी घुमक्कड़ कबीलों के अवशेष हैं .आदमी भारत में पैदा नहीं हुआ, वो अफ्रीका में पैदा हुआ बताया जाता है .जब आदि मानव अफ्रीका में पैदा हुआ है तो कोई अन्य किसी देश का मूल निवासी कैसे हो सकता है ?
 वैसे बाद में आकर बसने वालों से शिकायत क्या है ? क्या वो इस देश के प्रति वफादार नहीं हैं ? क्या मूल  निवासी आदिवासी को इसलिए देश को लूटने की छूट   दी जा सकती है क्यूँकि वो इस देश में पहले आये थे ? देश के प्रति वफादारी और जनता के प्रति ईमानदारी तो सबको बराबर रखनी होगी और समान अपराध के लिए सब दंड के बराबर के भी  भागीदार ही होंगे .भारत का दंड विधान   देशी और विदेशी मूल में कोई भेद नहीं करता है .
विदेशी मूल का विवाद उठाकर ये नेता जनता की समस्यायों से ध्यान भटकाने की कौशिश न करें .माना कि जीतन राम मांझी ईमानदार नेता हैं लेकिन उन्हें ईमानदारी से जनता की सेवा भी करनी होगी जिसका मौका उन्हें मिला है . कहीं ऐसा न हो कि उनका नाम भी मधु  कोड़ा और शिब्बू  सोरेन जैसे आदिवासी नेताओं में शुमार किया जाए .

   २-    'बधाई जीतन राम माझी जी'----- मुकेश  विस्सारवाल  इंसा

मै आपके हिम्मत को दाद देता हूँ। मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए जितना साहसिक बयान आपने दिया है वह निश्चय ही काबिले तारीफ है।
कानून मंत्री रहते हुए बाबा साहब डा भीम राव अम्बेडकर जी ने लखनऊ में कहा था कि जिस दिन पिछड़ा-दलित एकजुट हो गया उस दिन पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त जैसे लोग इनके जूते की फीतियाँ बांधने में गर्व महसूस करेंगे। अम्बेडकर साहब के बाद सम्भवतः माझी जी दूसरे ऐसे राजनेता हैं जिन्होंने बड़े पद पर रहते हुए यह कहा है कि सवर्ण या बड़ी जातियों के लोग विदेशी हैं। बेतिया में माझी जी ने एक कार्यक्रम में कहा कि आदिवासी,अनुसूचित और गरीब ही इस देश के मूल निवासी हैं जबकि अगड़ी जाति के आर्य नस्ल के लोग दूसरे देश से आये विदेशी हैं।
बिलकुल यथार्थ बोलते हुए बिहार के सी एम ने क्रन्तिकारी विचार व्यक्त किया है। वैसे प्रायः सभी इतिहासकार तथा नेहरु,तिलक आदि ने भी इसे स्वीकारा है।मार्कण्डेय काटजू जी व ज्ञानसुधा मिश्रा जी के बेंच ने भी सुप्रीम कोर्ट में चल रहे एक मुकदमे के फैसले में यही कहा है। डी एन ए रिपोर्ट ने भी इस धारणा को पुष्ट कर दिया है। मांझी साहब का आकलन जहाँ सही है वहीं हिम्मत से भरा हुआ भी है। मुख्यमंत्री के पद पर आसीन माझी जी का बयान क्रन्तिकारी है। हम माझी जी को इसके लिए साधुवाद देते हैं।
                                                                   ----- मुकेश  विस्सारवाल  इंसा


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