मंगलवार, 25 नवंबर 2014

जर्मन संस्कृत भाषा विवाद

             
  भारत में शिक्षा के क्षेत्र में इतने अजब गजब सुधार बिगाड़ जल्दी जल्दी होते  रहते हैं कि बच्चे शिक्षार्थी न रहकर सरकारी प्रयोगशाला के ऐसे जीव होकर रह जाते हैं जिनका जीवन  एक प्रयोग के होने तक के लिए है . बाकी उस प्रयोग से वे सही सलामत रहते हैं या किसी तरह की विकलांगता का शिकार होते हैं इससे किसी को ज्यादा कुछ फर्क नहीं पड़ता है .हर सत्र में किताबें बदलती हैं पाठय सामग्री बदलती है .अब इस ताजा विवाद को देखिये जो केंद्रीय विद्यालयों में जर्मन भाषा को हटाकर संस्कृत भाषा को लाने को लेकर उत्पन्न हुआ है .कहा जा रहा है कि त्रिभाषा फार्मूले के अंतर्गत जर्मन नहीं पढ़ाई जा सकती है, जर्मन विदेशी भाषा है. सबसे पहले तो यही बात समझ में नहीं आता  है कि सारे बच्चों को जर्मन भाषा सिखाने का फैसला किस विद्वान ने लिया था ? क्या सारे बच्चे जर्मनी जाएंगे या जर्मन भाषा संयुक्त राष्ट्र से विश्व भाषा घोषित हो गयी है ?
 दूसरी बात ये कि जिस त्रिभाषा सूत्र की बात कही जाती है उसमें कहाँ लिखा है कि आप संस्कृत अनिवार्य रूप से पढ़ाएंगे ? उस सूत्र के हिसाब से तो मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा और राजभाषा [ हिंदी सहभाषा अंगरेजी ] पढ़ाई जानी चाहिए या एक भाषा अन्य क्षेत्रीय भाषा होनी चाहिए .
 अन्य क्षेत्रीय  भाषा से आशय हिंदी भाषियों के लिए पंजाबी ,तमिल कन्नड़ आदि था लेकिन उन्होंने चालाकी की और दूसरे राज्य की भाषा पढ़ाने के स्थान पर संस्कृत को पढ़ाना शुरू कर दिया .इससे दक्षिण भाषियों के मन में भाषा को लेकर एक चिढ पैदा हो गयी और उन्होंने हिंदी का विरोध किया .यद्यपि वे विरोध करते रहे और हिंदी सीखते गए लेकिन उत्तर भारत के हिंदी भाषी शातिराना चुप्पी साधे संस्कृत सीखने के नाम पर तोता रटंत में लगे रहे .यद्यपि संस्कृत एक समृद्ध भाषा है वह ज्ञान विज्ञान से भरपूर है लेकिन पढने और पढ़ाने वालों ने उसका उपयोग मात्र  परीक्षा  में अधिक अंक लाने तथा सुभाषित रटने और ज्यादा से ज्यादा धार्मिक कर्म काण्ड पूरे करने तक ही किया. इसका हिंदी भाषियों को दोहरा नुकसान हुआ वे दक्षिण भारत की भाषाओं के ज्ञान से वंचित रहे जिससे हिंदी की भाषायी समृद्धि बाधित हुई और राष्ट्रीय एकात्मकता कमजोर रही .
             अगर  संस्कृत के साथ साथ उर्दू पढने का विकल्प भी दिया होता  तो बहुत कुछ इस नुकसान की भरपाई  हो सकती थी यद्यपि अन्य क्षेत्रीय  भाषाओं का ज्ञान प्राप्त  करने की जरुरत  फिर  भी बनी   रहती  लेकिन इस सारे विवाद  में उर्दू तो कहीं  है ही नहीं .  उर्दू न मातृभाषा के रूप में कहीं पढ़ाई जाती है न क्षेत्रीय भाषा के रूप में कहीं शामिल है और राष्ट्रभाषा  के रूप में तो कोई उसका नाम भी नहीं लेना  चाहता है जबकि जिस हिन्दी के राष्ट्रभाषा  होने की वकालत की गयी थी वह देवनागरी में लिखी जाने  वाली  उर्दू ही है फिर भी उर्दू को बेगाना  कर दिया गया.हाँ  जर्मन और संस्कृत भाषा ले कर खूब छाती कूटी जा रही है जिनका भारत में कहीं प्रचलन ही नहीं है .
 तर्क दिया जा रहा है कि वैश्वीकरण के दौर में विश्व के विभिन्न देशों के जानकार होना जरूरी हैं .इस बात से किसे इंकार है कि विदेशी भाषाओं के जानकार होने चाहिए ? लेकिन इसके लिए आप किसी एक और भाषा की शिक्षा को आप बच्चों पर न लादें तो बेहतर होगा. शिक्षा को आपने चूँ चूँ का मुरब्बा बना दिया है जो मन चाहे उसमें ठूंसते रहते हैं .अरे जिसको जिस भाषा की जरुरत हो वो स्कूली शिक्षा के बाद उसे सीख लेगा आप क्यों परेशान हो ? अगर आप भाषाओं के प्रति इतने ही संवेदनशील हैं तो लुप्त प्राय आदिवासी भाषाओं और बोलियों को सरंक्षित करने का काम कीजिये .उनका शब्द कोश उनका साहित्य प्रकाशित कीजिये .विदेशी भाषा के शिक्षण  प्रशिक्षण  का काम  विदेशी दूतावासों का होना चाहिए या विश्वविद्यालय स्तर पर इसकी व्यवस्था कीजिये .स्कूल के स्तर पर शिक्षा का बोझ बढ़ाना उचित नहीं है .वहाँ शिक्षा को आसान और रोचक बनाया जाना चाहिए न कि तीन चार भाषाएँ सीखने का बोझ डालकर उसे और जटिल बनाएं .आखिर बच्चों को भाषा के अतिरिक्त अन्य विषय भी पढने होते हैं जो उनके जीवन यापन के लिए किसी भाषा से कम उपयोगी नहीं हैं .

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