बुधवार, 3 दिसंबर 2014

बाबरी मस्जिद की शहादत और लालकृष्ण आडवाणी



छ: दिसंबर नजदीक आ रहा है .मुझे लालकृष्ण आडवाणी का हाल बाबरी मस्जिद जैसा नजर आता है . दोनों में गजब की समानता दिखाई दे रही है .भक्तों की भावनाएं जब उफान पर होती है तो ऐतिहासिक तोड़ फोड़ होती हैं . बुलंद इमारतें टूटती हैं और मलबा बिखरता बिसूरता दिखाई देता है .
मुझे याद आ रहा है कि आजादी प्राप्ति की अर्ध रात्रि की बेला में  भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू  ने लाल किले से बोलते हुए कहा था कि 'यह नियति से मिलन है.'
 नियति से मिलन क्या होता है? ये तो मुझे नहीं पता है लेकिन लालकृष्ण आडवाणी का हाल देख कर आज मैं यह कह सकता हूँ कि 'यह नीयत से मिलन है. नियत मिलन है.' वह राजनीति की बुलंदी से जबरन वैसे ही गिरा दिए गये हैं जैसे बुलंद बाबरी मस्जिद गिरा दी गयी थी.
     बाबरी मस्जिद की शहादत का शोक भारत में बहुत लोगो को है लेकिन उनके लिए शोक करने वाला शायद कोई नहीं है, उनकी पार्टी में ही नहीं है. उनके हाल पर सिर्फ अफसोस ही किया जा सकता है .
कहा  जाता   है कि उस विवादित   स्थान के बारे  में निष्पक्ष  होकर   अपने   धर्म का पक्ष  रखिये  कि वहाँ क्या किया    जाए?
भाई जी   मेरा  धर्म  इंसानियत  है  और  मैं उसकी शपथ लेकर पूरी निष्पक्षता से कहता हूँ कि यदि उस स्थान में हमारा भी कुछ हिस्सा हो तो वहाँ एक पागलखाना खुलवा दो जहाँ साम्प्रदायिक पागलपन का निशुल्क इलाज   हो सके. अगर वो जगह किसी हिन्दू या मुसलमान की हो तो उसे दे दी जाए फिर वो संविधान के दायरे में वहाँ जो  चाहे करे.उसकी मर्जी के बिना चाहे  कितना  ही  अच्छा  काम  क्यों  न  हो  किसी  को  नहीं  करना  चाहिए. 

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