शनिवार, 20 दिसंबर 2014

'नागरिक सुरक्षा तंत्र'

             

        पाकिस्तान के पेशावर के एक स्कूल में पढ़ रहे बच्चों पर तालिबानी आतंकवादियों ने हमला कर उन्हें शहीद कर  दिया. सारे संसार में शोक और चिंता  व्याप्त  है, भारत  में इसे  आसन्न  खतरे की नजर  से  देखा  जा रहा है . टी वी और अखबार  रात  दिन  आतंकवाद के खतरे  से आगाह  कर  रहे  हैं. अनेक टी वी न्यूज  चैनल  के संवाददाता  राजधानी दिल्ली के स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था का हाल जानने के लिए निकल पड़े हैं. टी वी पर दिखाया जा रहा है कि पब्लिक  स्कूलों में गेट पर सुरक्षा गार्ड है और सी सी टी वी कैमरे  लगे  हुए  हैं, कहीं  कहीं  पुलिस कर्मी भी नजर  आते  हैं. लेकिन पुलिस हमेशा की तरह  सुरक्षा के प्रति लापरवाह दिखाई  देती  है . उधर  सरकारी स्कूलों में सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं है, ज्यादा से ज्यादा वो अपने स्कूल का मुख्य द्वार बंद कर सकते  हैं . इस सब को दिखाने  का मकसद  यही  है कि सरकार स्कूलों में पढने  वाले बच्चों  की हिफाजत के लिए पर्याप्त  सुरक्षा कर्मी तैनात करे .
    इसी प्रकार जब दिल्ली में निर्भया  बलात्कार   काण्ड  हुआ था तब सडकों  पर सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद  करने  की मांग उठायी  गयी थी. अभी पिछलों  दिनों  एक टैक्सी चालक द्वारा एक युवती के साथ बलात्कार  का मामला  सामने  आने  पर टैक्सी  चालकों  पर नजर  रखने  की आवश्यकता बतायी  गयी थी .
स्कूलों के अतिरिक्त  रेलवे  स्टेशन , बस  अड्डे ,आदि भीड़ भाड़ वाले सार्वजनिक स्थान  हैं जिनकी  सुरक्षा को पुख्ता  किया जाना  है, बैंक  हैं, ए  टी एम  मशीने  हैं  जिन्हें लुटेरों  से बचाना  है . बिजलीघर, बाँध  और बड़े पुल हैं जिन्हें आतंकवादियों  से सुरक्षित  करना  है. घर  से बाहर  जाने  वाली  महिलायें  हैं जिनकी  इज्जत  हमेशा खतरे में रहती है उनकी भी  सुरक्षा करनी  है. और इन सबसे बढकर  हमारे  वी वी आई  पी  हैं जिनकी  जान  हमेशा खतरे  में रहती है और जिनकी  सुरक्षा के लिए सुरक्षा कर्मियों  की कभी कोई कमी नहीं होती  है .
   इनके  अलावा   बिजली  और रेल  की लाइनें  हैं जिन्हें असामाजिक तत्व कभी कभी क्षतिग्रस्त  कर देते हैं,इन सबकी सुरक्षा के लिए पुलिस चाहिए . इसके  अलावा चोरी, डकैती,अपहरण ,तस्करी ,अतिक्रमण ,जाम जैसी समस्याएं हैं  जिनके  लिए  पुलिस वालों की जरुरत होती है. लेकिन जब  हर आदमी  हर स्थान  की  सुरक्षा के लिए पुलिस चाहिए तो इतनी   पुलिस आएगी  कहाँ  से ? और फिर इस  बात की क्या  गारंटी  है कि वो पुलिस सुरक्षा ही  करेगी ? आज  भी एक आम  आदमी  से पूछिए तो उसे सबसे ज्यादा  भय  पुलिस से ही  लगता  है. वो बड़े से बड़ा नुकसान  बर्दाश्त  कर लेता  है लेकिन पुलिस के पास जाना  नहीं चाहता  है. छत्तीसगढ़ .झारखंड .पूर्वोत्तर  भारत  और जम्मू  कश्मीर जैसे इलाकों  में अगर  आप  जनमत  संग्रह करा लें तो ये पाएंगे  कि वो सुरक्षाबलों और पुलिस से सबसे ज्यादा  उत्पीड़ित  हैं. ऐसे में हर जगह  पुलिस को हिफाजत के लिए लगाने की मांग करना बड़ी बेतुकी  सी बात लगती है . वैसे भी यह व्यवहारिक  नहीं है . इससे  भी बड़ी बात ये है कि अनेक बार स्वयं पुलिस कर्मी अपने को असुरक्षित  पाते  हैं और उन्हें  खुद  अपनी सुरक्षा की दरकार होती  है . राजधानी दिल्ली हो या यू  पी  का प्रतापगढ़ पुलिस की जान  और मान हमेशा खतरे  में रहती  है .ऐसे  में आप ही बताएं      कि कौन किसकी सुरक्षा कर सकता है ?
  एक चुटकला  है जिसमें पुलिस वाला कहता  है कि मेरी  ड्यूटी  वहाँ   न लगाई जाए जहां अपराध हो गया   हो बल्कि मेरी  ड्यूटी  वहाँ  लगाई  जाए  जहां  अपराध होने वाला है ताकि मैं  इधर  उधर  भागने  की अपेक्षा  उस  अपराधी  को पकड़ सकूँ जो अपराध कर रहा है .
इसलिए  मेरा यह मानना है कि पुलिस को इधर  उधर  छितरा  देने  की अपेक्षा यह उचित  होगा  कि हम अपने  ख़ुफ़िया  तंत्र को मजबूत करें ताकि वो हमें  समय  पर अपराधियों  के मंसूबों के बारें में सूचना दे और फिर हम पुलिस को उन अपराधियों  को पकड़ लाने  के लिए भेज  दें. इसी के साथ ये भी जरुरी  है कि हम समाज  में ऐसा माहौल बनाएं ताकि कोई नागरिक  अपराध  की ओर  उन्मुख न हो .इसके लिए हमारी  सोच और व्यवस्था में बड़े बदलाव  की जरुरत है. इसमें  आमूल चूल परिवर्तन किये बिना आतंकवाद और अन्य  अपराधों पर रोक संभव नहीं होगी.      

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