सोमवार, 22 दिसंबर 2014

धर्मांतरण का मुद्दा


धर्मांतरण का मुद्दा बहस में है.गोडसे की मूर्ती स्थापना का मुद्दा भी बहस में है.कभी मंदिरों मस्जिदों पर लाउडस्पीकर लगाने हटाने का मुद्दा भी गरमा जाता है. गोरक्षा का मुद्दा भी उठ कर रहेगा. गीता  को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित किया जाए या नहीं इस पर बहस होती है .जनगणमन  को राष्ट्रगान से हटाने की बात होती है .संस्कृत पढने की  जरुरत पर भी बहस जारी है . ड्रेसकोड भी लागू हो ये मांग भी जब तब उठती ही रहती है . अब बहस ऐसे ही मुद्दों पर होगी .मंहगाई नहीं नहीं, बेरोजगारी कहीं नहीं,भूख बीमारी अभी नहीं इन मुद्दों पर अब खामोशी रहेगी .ये बिलकुल गैर जरुरी हैं .
   नौजवान सुन रहे हैं न ? नौकरी तो नहीं चाहिए न ? चहिये  तो शाखा में जाइए .भागवत कथा सुनिए .हिन्दू मर्जी से नहीं गए जोर जबरदस्ती से लूट लिए गए .
'हराम का माल' था क्या जो लूट ले गए. वापिस लाएंगे .वहाँ तक जहाँ तक थे .अब कौन समझाये कि हम माल नहीं थे जो कोई भी लूट ले,हराम के तो बिलकुल नहीं थे .वैसे अगर आदिवासी मूल निवासी कहलाने वाले लोग भी घर वापसी शुरू कर दें तो हिन्दू बचेंगे कितने ?फिर घर वापसी धर्म में ही क्यों हो रहवास में भी क्यों न हो ?
वैसे मैं कहता हूँ धर्मांतरण की  पंच वर्षीय योजना शुरू होनी चाहिए. आदमी चार पांच साल एक धर्म में रहे उसे देखे परखे और फिर दूसरे धर्म में चला जाए .इससे वह सब धर्मों को नजदीक से देखभाल लेगा और हो सकता है की उसे ये समझ में आ जाए कि इस धर्म की चक्की में पिसने पीसने से अच्छा है वो इससे दूर ही रहे .

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