मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

अम्मी लो मैंने ज़िद छोड़ दी

शूट आउट एट पेशावर स्कूल : शकील का ख़त अम्मी के नाम
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अम्मी लो मैंने ज़िद छोड़ दी
नये बैग की
लंच बाक्स की
नई पानी की बोतल की
न चाहिये शार्पनर
न इरेज़र
सब कुछ तो 'इरेज़' कर दिया
'तालीबान'* ने
'मलाला' आपा से कहना
'तालीम' की राह में
अब वो अकेली नहीं रही
हमने भी गोलियाँ खाई हैं
बराबर के हकदार हैं
उसके 'नोबल' में
और वो जो नये कपड़े
कल ही सिल कर आये हैं
अब मुझे पहनाना
ठंडे पानी से अब
जरा भी डर नहीं लगता
जितना जी चाहे नहलाना
नींद में अलसाये बच्चे को,
माँ ने उठाकर बिस्तर से,
ठंड में भेज दिया नहाने को,
बडबडाते हुए, जल्दी कर बेटा,
बस, स्टॉप पर है आने को,
लाड से लाडले को निहारा,
और टिफिन थमा दिया,
स्कूल ले जाने को,
उस माँ को क्या पता था,
बेटे को आखिरी बार
रूखसत कर रही है
फिर ना कभी घर वापस
लौट कर आने को,
इंसानियत के दरिंदों की
एक गोली ने,
दे दिया उस माँ को
कभी ना खतम होने वाला इंतज़ार,
और
जिदंगी भर का गम,
अपने जिगर के टूकड़े की याद मे
तड़पने और आसूं बहाने को !!!!


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